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भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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शब्दावली

(१०७)

निवेरा ॥ टे० ॥ तरुवर एक मूल विन ठाढो विन फूले फल लागा । साखा पत्र कछू नहिं वाके अष्ट गगन सुख जागा ॥ पौ विन पत्र करह विन तुम्बा विनु जिह्वा गुन गावै । गावन हारके रूप न रेखा सतगुरु होइ लखावै ॥ पंछिक खोज मीनको मारग कहैं कवीर दोउ भारी । अपरम पार पार पुरुषोत्तम मूरतिकी बलिहारी ॥ २४ ॥

शब्द ४१३-अवधू ओ तत रावल राता । नाचै बाजन बाज बराता ॥ टे० ॥ मौरके माथे दुलहा दीन्हो अकथा जोर कहाता । मडवक चारन समधी दीन्हो पुत्र विवाहल माता ॥ दुलहिन लीप चौक बैठाये निरभय पद परभाता । भातहिं उलटि बरातहिं खायो भली बनी कुशलाता ॥ पाणि ग्रहण भये भव मंडयो सुषुप्तनि सुरति समाता ॥ कहैं कवीर सुनो हो संतो बूझो पंडित ज्ञाता ॥ २५ ॥

शब्द ४१४-कोइ विरला दोस्त हमारा भाइ रे बहुत का कहिये । गांठन भजन संवारे सोई ज्यों राम रखे त्यों रहिये ॥ टे० ॥ आसन पवन जोग श्रुति सुमृति ज्योतिष पढि बैलाना । छौ दरशन पाखंड छानवे ये कल काहु न जाना ॥ आलम दुनी सकल फिरि आये या कल जीव न आना । ताही करिके जगत उठावे मनमें मनन समाना ॥ कहैं कवीर जोगी औ जंगम फीकी उनकी आशा । रामै नाम रटे ज्यों चात्रिक निश्चय भगति निवाशा ॥ २६ ॥

शब्द ४१५-भाई अदुत रूप अनूप कथा है कहौं तोको पति-याई । जहँ जहँ देखौं तहँ तहँ सोई सब घट रह्यो समाई ॥ टे० ॥ लच्छ विनु सुख दरिद्र विनु दुख है नौंद विना सुख सोवै ॥ जस विनु ज्योति रूप विनु आशिक रतन विहूना रोवै ॥ भरम विनु