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भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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(११४)

कवीरपंथी—

छः दरशनमें जे परवाना तासु नाम मन माना । कहै कवीर हमहीं हैं बौरै ई सब खलक स्याना ॥ ४८ ॥

शब्द ४३७-बुझ बुझ पंडित पद निर्बाना । सांझ परे कहंवा बस भाना ॥ ८० ॥ नीच ऊंच पर्वत ढेल न भीत । विन गायन तहवां उठ गीत ॥ ओस न प्यास मन्दिर नहिं जहंवां । सहसौ घेनु दुहावै तहवां ॥ नितै अमावस नित संकांती । नित नित नव ग्रह बैठे पांती ॥ मैं तोहि पूछौ पंडित जना । हृदया ग्रह न लागु केहि खना ॥ कह कवीर इतनो नहिं जान । कौन शब्द गुरु लागा कान ॥ ४९ ॥

शब्द ४३८-बुझ बुझ पंडित विरवा न होई । अध बस पुरुष अधा बस जोई ॥ ८० ॥ विरवा एक सकल संसारा । सरग शीश जर गेल पतारा ॥ बारह पखुरी चौबिस पाता । घन बरोह लागी चहुं घाता ॥ फलै न फूलै वाकि है बानी । रैन दिवस विकार जुव पानी ॥ कह कवीर कछु अच्छलो न जहिया । हरि विरवा प्रतिपालत तहिया ॥ ५० ॥

शब्द ४३९-बुझ बुझ पंडित मन चितलाय । कबहिं भरल वहे कबहि सुखाय ॥ ८० ॥ खन ऊबे खन डूबे खन अवगाह । रतन न मिले पाव नहिं थाह ॥ नदिया नाहिं सरस बहे नीर । मच्छ न मरे केवट रहे तीर ॥ पोहकर नहीं बांधल तहं घाट । पुरइनि नहीं कमल महि बाट ॥ कहै कवीर यह मनका धोखा । बैठारहै चला चह चोखा ॥ ५१ ॥

शब्द ४४०-बूझ लीजे ब्रह्म ज्ञानी । घुरि घुरि बरषा बरषावै परिया बुंद न पानी ॥ ८० ॥ चीटीके पग हस्ती बांधे छेरी बीगै खायो । उदधि मांहते निकसि छांछरी चौड़े गेह करायो ॥ मेढुक सर्प रहै इक संगे बिछी स्वान बियाही । नितउठि सिंह सियार सों

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