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भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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शब्दावली

(९१५)

डरपै अद्भुत कथो न जाही ॥ (कौने) संशय भूगा तन वन घेरे पारथ बाना मेले । शायर जरे सकल वन ढाहै मच्छ अहेरा खेले ॥ कह कवीर यह अद्भुत ज्ञाना को यहि ज्ञानहि वूझे । विनु पंखै उड़ि जाय अकाशे जीवहि मरन न सूझे ॥ ५२ ॥

शब्द ४४१-वह विरवा चीन्है जो कोय । जरा मरन रहितै तन होय ॥ टे० ॥ विरवा एक सकल संसारा । पेड एक फूटल तिन डारा ॥ मध्यके डार चारि फल लागा । साखा पत्र गनत को बागा ॥ वेलि एक त्रिभुवन लपटानी । बांधेते छूटिहि नहि प्रानी ॥ कहहि कवीर हम जात पुकारा । पंडित होय सो करे विचारा ॥ ५३ ॥

शब्द ४४२-साईके संग सासुर आई । संग न सूती स्वाद न मानी गौ जौबन सपनेकी नाई ॥ टे० ॥ जना चार मिलि लगन सोधाई जना पांच मिलि मंडप छाई । सखी सहेली मंगल गावै दुख सुख माथे हरदि चढाई ॥ नाना रूप परी मन भांवरि गांठी जोरि भई पतियाई । अरघै दैदै चली सुवासिनि चौकहि रांड भई संग साई ॥ भयो विवाह चली बिन दूलह बाट जात समधी समझाई । कहै कवीर हम गौने जैबे तरव कन्त ले तूर बजाई ॥ ५४ ॥

शब्द ४४३-नलको ढाढस देखो आई । कछु अकथ कथा है भाई ॥ टे० ॥ सिंहसारदूल यक हर जोतिनि सीकस बोइन धाना । बनकी खुलइया चाखुर फेरे छागर भये किसाना ॥ छेरी बाघहि व्याह होत है मंगल गावै गाई । बनके रोझ धै दाइज दीन्हों गोह लोकंदै जाई ॥ कागा कपडा धोवन लागे बकुला किररे दांता । मांछी मूँड सुडावन लागी हमहुं जाब बराता ॥ कहहि कवीर सुनो हो सन्तो जो यह पद अर्थौवै । सोई पंडित सोई ज्ञाता सोई भक्त कहावै ॥ ५५ ॥

शब्द ४४४-नलको नहि परतीति हमारी । झूठे बनज कियो