कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कबीरपंथी—
झूठे सन पूंजी सबै मिलि हारी ॥ टेक ॥ षट दरशन मिलि पंथ चलायो तिरदेवा अधिकारी । राजा देश बडो परपंची रैयत रहत उजारी ॥ इतते उतरहु उतते उतरहु जमकी साट सवारी । ज्यों कपि डोर बांधि बाजीगर अपने खुशी परारी ॥ यहै पैठ उतपति परलयको विषया सबै विकारी । जैसे स्वान अपावन राजी त्यों लागी संसारी ॥ कहैं कबीर यह अद्भुत ज्ञाना मानो बात हमारी । अजहूं लेहुं छोडाय कालसों जो घट सुरति संभारी ॥ ६६ ॥
शब्द ४४५—न हरि भजसि न आदत छूटी । शब्दै ससुझि सुधारत नाही अंधरे भये हियेकी फूटी ॥ टे० ॥ पानी माहि पषानकी रेखा ठोंकत उठै भभूका । सहस घडा नितहीं जल ढारे फिर सूखेका सूखा ॥ सेते सेते सेत अंग भौ सैन बढो अधिकाई । जो सन्निपात रोगि यहि मारे सो साधुन सिधि पाई ॥ अनहद कहत कहत जग विनसे अनहद सुधि समानी । निकट पयाना जमपुर धावै बोलहि एकै बानी ॥ सतगुरु मिलै बहुत सुख लहिया सतगुरु शब्द सुधारे । कहैं कबीर सो सदा सुखारी जो यहि पदहि विचारे ॥ ६७ ॥
शब्द ४४६—नरहर लागी दाव विकार विन ईधन मिलै न बुझावन हारा । मैं जानों तोही ते व्यापै जरत सकल संसारा ॥ टे० ॥ पानी माहि अग्नि को अंकुर मिलन बुझावन पानी । एक न जरे जरे नौ नारी जुगति न काहू जानी ॥ सहर जरे पहरू सुख सोवै कहे कुशल घर मेरा । पुरिया जरे वस्तु निज उबै बिकल राम रंग तेरा ॥ कुबिजा पुरुष गले यक लागी पूजि न मनकी साधा । करत विचार जनम गौ खीसा ई तन रहत असाधा ॥ जानि बूझ जे कपट करत है तेहि अस मन्द न कोई । कहे कबीर सब नारि रामकी मोते और न होई ॥ ६८ ॥