कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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शब्द ४४७-माया महा ठगनी हम जानी। निरगुन फ्रांस लिये कर ढोलै बोलै मधुरी बानी ॥ टेक ॥ केशवके कमला है बैठी शिवके भवन भवानी। पंडाके मूरति है बैठी तीरथमें भइ पानी ॥ जोगीके जोगिन है बैठी राजाके घर रानी। काहूके हीरा है बैठी काहूके कौडी कानी ॥ भगतनके भगतिन है बैठी ब्रह्माके ब्रह्मानी। कहै कवीर सुनो हो संतो यह सब अकथ कहानी ॥ ५९ ॥
शब्द ४४८-माया मोह मोहित कीन्ह। ताते ज्ञान रतन हरि लीन्ह ॥ टेक ॥ जीवन ऐसो सपना जैसो जीवन सपन समाना। सबद गुरु उपदेश दियो तैं छाव्यो परम निधाना ॥ जोतिहिं देखि पतंग हुलसे पशु नहिं पेखै आगी। काम क्रोध नल सुगुध परेहैं कनक कामिनि लागी ॥ सग्यद सेख किताब नीरेखे पंडित शास्त्र बिचारे। सत गुरुके उपदेश विना तुम जानिकै जीवहि मारे ॥ करौ विचार बिकार पीर हरौ तरन तारने सोई। कह कवीर भगवंत भजन करु द्वितिया और न कोई ॥ ६० ॥
शब्द ४४९-मरिहौ रे तन काले करिहौ। प्राण छुटै बाहर लै धरिहौ ॥ टे० ॥ काया विगुरचनि अनवनि बाटी। कोइ जारे कोइ गाडै माटी ॥ हिंदू लै जारे तुरुक लै गाडै। यहि बिधि अन्त दुनौ घर छाडै ॥ करम फ्रांस जम जाल पसार। ज्यों धीमर मछरी गहिमारा ॥ राम विना नल हैहो कैसा। बाट माझ गोबरौरा जैसा ॥ कह कवीर पाछे पछतैहौ। या घरसे जब वा घर जेहौ ॥ ६१ ॥
शब्द ४५०-माइ मैं दूनों कुल उजियारी। बारह खसम नेहरे खायो सोरह खायो ससुरारी ॥ टेक ॥ सासु ननद मिलि पटिया बांधल भंझुरा परलौ गारी। जारों मांग मैं तासु नारि की सरिवर रचल हमारी ॥ जनाँ पांच कोखियामें राखों औ राखों दुइ चारी। पार परोसिनि करों कलेवा संगहिं बुधि महतारी ॥ सहजै बपुरी