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भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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(११८)

कबीरसंथी-

सेज बिछायो सुतलों पांव पसारी । आउं न जाउं मरों नहिं जीवों साहब मेटल गारी ॥ एक नाम मैं निज के गहिह्यो तो छूटल संसारी । एक नाम मैं बढिके लेखौ कहै कवीर पुकारी ॥ ६२ ॥

शब्द ४५१-मैं कासों कहौ को सुने को पतियाय । फुलवाके छुवत भँवर मरिजाय ॥ टेक ॥ गगन मँडल बिच फुल यक फूला । तर भो डार उपर भो मूला ॥ जोतिय न बोइये सिचिय न सोह । बिन डार बिन पात फुल यक होह ॥ फुल भल फुलल मालिनि भल गांथल । फुलवा विनसि गयल भँवर निरासल ॥ कह कवीर सुनो सन्तो भाई । पंडित जन फुल रहै लुभाई ॥ ६३ ॥

शब्द ४५२-जोलहा हो बिनहु हहिमाना । जाके सुर नर सुनि धैर ध्याना ॥ टेक ॥ ताना तने को अउठा लीन्हे चर्खी चारिहु वेदा । सर खुंटी इक राम नरायण पूरन परगटे भेदा ॥ भवसागर यक कठवत कीन्हो तामे माडी सानी । माडीको तन माडिरह्यो है माड़ी विरला जानी ॥ त्रिभुवन नाथ जो मंज्जन लागे स्याम सुरार या दीना । चांद सूर दोय गोडा कीन्हो मांझ दीप किय तीना ॥ पाई करिके भरना लीन्हों वे बान्धैको रामा । वय भरी तिहुं लोके बांधैं कोह न रहै उबामा ॥ तीन लोक यक करिगह कीन्हो दिग मग कीन्हो ताना । आदि पुरुष वैठावन बैठे कविरा ज्योति समाना ॥ ६४ ॥

शब्द ४५३-जोगिया फिर गयो नगर मझारी । जाय समान पांच जहाँ नारी ॥ टेक ॥ गये देशांतर कोई न बतावे । जोगिया बहुरि गुफा नहिं आवे ॥ जरिगौ कंथ ध्वजा गौ टूटी । भजिगो दंड खपर गौ फूटी ॥ कह कवीर यह कलि है खोटी । जो रह करवा निकसे टोटी ॥ ६५ ॥