कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथी-
हरि केरा ॥ ६० ॥ इन्द्री कहाँ करै विसरामा । सो कहैं गये जो कहते रामा ॥ सो कहैं गये होत स्यान । होय मृतक यहि पदहि समान ॥ रामानन्द रामरस छाके । कह कवीर हम कहि कहि थाके ॥ ७७ ॥
शब्द ४६६-अब हम जाना हो हरि बाजीको खेल । डंक बजाय देखाय तमाशा बहुरि सो लेत सकेल ॥ ६० ॥ हरि बाजी सुर नर मुनि जहँडे माया चेटक लाया । धरमें डारि सबन भरमाया हृदया ज्ञान न आया ॥ बाजी झूठ बाजीगर साँचा साधुनकी मति ऐसी । कहहिँ कवीर जिन जैसी समुझी ताकी गति भइ तैसी ॥ ७८
शब्द ४६७-कहो हो अम्बर कासों लागा । चेतन हारे चेतु सुभागा ॥ अम्बर मध्ये दीसै तारा । यक चेतै दूजे चेतवन हारा ॥ ६० ॥ जेहि खोजै सो उहवाँ नहीं । सो तो आहि अमरपद माहीं ॥ कह कवीर पद बूझै सोइ । मुख हृदया जाके यक होई ॥ ७९ ॥
शब्द ४६८-बन्दे करिले आप निवेरा । आप जियत लखु आप ठवर करु मुखे कहाँ घर तेरा ॥ टेक ॥ यहि अवसर नहिँ चेतौ प्रानी अन्त कोई नहीं तेरा । कहैं कवीर सुनो हो संतो कठिन कालको घेरा ॥ ८० ॥
शब्द ४६९-रहु रराँ मम्माकी भांती हो सब संत उधारन चूनरी ॥ ६० ॥ बालमीकि बन बोइया चूनि लिया शुक्रदेव । कर्म बेनौरा है रह्यो सुत काते जयदेव ॥ तीन लोक ताना तनो ब्रह्मा विष्णु महेश । नाम लेत मुनि हारिया सुरपति सकल नरेश ॥ विन जिह्वा गुन गाइया विन वस्तीका गेह । सूने घरका पाहुना तासों लावे नेह ॥ चार वेद कैडा कियो निरंकार किय रास । विने कवीरा चूनरी पहिरे हरिके दास ॥ ८१ ॥