कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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शब्द ४७०-तुम यहि विधि समझौ लोईं। गोरी सुख मंदिर बजोईं ॥ टेक ॥ एक सगुन षट् चक्रहि बेघै वित्तु वृषभ कोल्हू मांजै। ब्रह्मै पकरि अग्निमां होमै मछ गगन चटि गजै ॥ नितै अमावस नितै ग्रहन होय राहु ग्रास नित दीजै। सुरभा भच्छन करै वेद सुख घर बरसै तन छीजै ॥ पहुमिक पानी अम्बर भरिया यह अचरज को कीजै। त्रिकुटि कुंडल मध मन्दिर बाजै औघट अम्बर भीजै ॥ कहै कवीर सुनो हो संतो जोगिन सिद्धी प्यारी। सदा रहै सुख संजम अपने बसुधा आदि कुंवारी ॥ ८२ ॥
शब्द ४७१-भुला वे अहमक नादाना। तुम हरदम रामहि ना जाना ॥ टे० ॥ बरबस आनिके गाय पछारी गला काट जिव आप लिया। जीता जीव सुरदा करि डरि तिसको कहत हलाल किया ॥ जाहि माँसुको पाक कहत हैं ताकी उत्तपति सुनु भाई। रज वीरज सो माँस उपानी मासु नापाक जो तुम खाई ॥ अपने दोष कहत नहिं अहमक कहत हमारे बडेन किया। उसकी खून तुम्हारी गर्दन जिन तुमको उपदेश दिया ॥ सियाहा गई सफेदी आई दिल सफेद अजहूं न हुआ। रोजा निमाज बांग क्या कीजै हुजरे भीतर बैठि सुआ ॥ पंडित वेद पुरान पढे सुलना पढै सो कुराना। कह कवीर वे नरक गये जिन हरदम रामहिं ना जाना ॥ ८३ ॥
शब्द ४७२-काजी तुम कौन किताब बखाना। झंखत बकत रहौ निशि बासर मति एकौ नहिं जाना ॥ टे० ॥ सकति न मानै सुनति करतहौ मैं न बदोंगा भाई। जो खोदाय तुव सुनति करत तो आप काटि किन आई ॥ घालि जनेऊ ब्राह्मन होना मेहरीको क्या पहिराया। वो तो जन्मकी शूद्रिन परोसा सो तुम पांडे क्यों खाया ॥ हिन्दू तुरुक कहांते आये किन यह राह चलाई। दिलमें खोजु खोज दिलहीमें भिस्त कहां किन पाई ॥ ८४ ॥