सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

पृष्ठ 938, कुल 968 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 938

(१२४)

कवीरपंथी—

शब्द ४७३—भूला लोग कहै घर मेरा । जा घरवामें फूला ढोलै सो घर नाहीं तेरा ॥ टे० ॥ हाथी घोडा बैल बाह्नो संग्रह कियो घनेरा । बस्तीमेंसे दियो खदेरी जंगल कियो बसेरा ॥ गांठी बांध खरच नहिं पठयो बहुरि कियो नहिं फेरा । बीबी बाहर हिरम महलमें बीच मियांको डेरा ॥ नौ मन सूत अरुझि नहिं सुरझै जनम जनम अरुझेरा । कहैं कवीर सुनो हो संतो यहि पदका करो निवेरा ॥ ८५ ॥

शब्द ४७४—कविरा तेरो घर कंदलामें यह जग रहत भुलाना । गुरुकी कही करत नहिं कोई अमहल महल दिवाना ॥ टेक ॥ सकल ब्रह्ममें हंस कवीरा काग न चाँच पसार । मनमत कर्म धरे सब देही नाद बिडु विस्तारा ॥ सकल कवीरा बोले बानी पानीमो घर छाया । लूटि अनन्त होत घट भीतर घटका मरम न पाया ॥ कामिनि रूपी सकल कवीरा मिरगा चरिन्दा होई । बड़ बड़ ज्ञानी मुनिवर थाके पकरि सकै नहिं कोई ॥ ब्रह्मा वरुन कुबेर पुरंदर पीपा प्रह्लाद चाखा । हिरनाकुश नख उदर विदारा तिनहुक काल न राखा ॥ गोरख ऐसो दत्त दिगम्बर नाम देव जयदेव दासा । उनकी खबर कहत नहिं कोई कहाँ कियो है बासा ॥ चौपर खेल होत घट भीतर जन्मके पास ठारा । दम दमकी कोइ खबरि न जाने करि न सकै निरुआरा ॥ चारि दिशा महिमंड रच्यो है रूप साम विच डिछी । ता ऊपर कछु अजब तमाशा मारे है जम किछी ॥ सकल अवतार जासु महिमंडल अनंत खडो कर जोरे । अद्भुत अगम अथाह रच्यो है ई सब शोभा तोरे ॥ सकल कवीरा बोलै बीरा अजहुं हो हुशियारा । कहैं कवीर गुरु सिकली दरपन हरदम करो पुकारा ॥ ८६ ॥