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भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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शब्दावली

(१२५)

शब्द ४७५—कविरा तेरो घर कन्दलामें मने अहेरा खेले । वपुवारी आनन्द मिरगा रुची रुची सर मेलै ॥ टेक ॥ चेतन रावल पावन खंडा सहजहि मूले बांधे । ध्यान धनुष धरि ज्ञान बान बन जोगसार सर साधे ॥ षट् चक्र वेधि कमल वेध्यो जब जाय उजारी कीन्हा । काम क्रोध अरु लोभ मोह ये हांकि साउजन दीन्हा ॥ गगन मध्य रोक्यो सो द्वारा जहां दिवस नहि राती । दास कवीर जाय सो पहुंच्यो सब बिछुरयो संग संचाती ॥ ८७ ॥

शब्द ४७६—सावज न होई भाइ सावज न होइ । वाको माँस भखै सब कोइ ॥ टेक ॥ सावज एक सकल संसारा अविगत वाकी बाता । पेट फारि जो देखियरे भाई आहि करेज न आंता ॥ ऐसी बाकी माँसु रे भाई पल पल मासु बिकई । हाड गोड लै धूरि पवारे आगि धुवां नहि खाई ॥ शिर औ सींग कछू नहि बाके पूछ कहां वह पाई । सब पंडित मिलि धनधे परिया कवीर बनौरी गाई ॥ ८८ ॥

शब्द ४७७—सुभागे केहि कारन लोभ लागे रतन जनम खोयो । पूरब जनम भूमिके कारन बीज काहेको बोयो ॥ टेक ॥ पानीसे जिन पिंडे साजे अभ्रिहि कुंड रहाया । दसे मास माताके गरभ कठि बहुरि लागिलि माया ॥ बालकसे पुनि त्रिध हुआ है होनी रही सो होवे । जब जम ऐहैं बांधि ले जैहैं नयन भरीभरि रोये ॥ जीवनके जनि आशा राखो काल गहैंहै स्वासा । बाजी है संसार कवीरा चित् चेति ठारो पास ॥ ८९ ॥

शब्द ४७८—संत महंतो सुमिरो सोई जो काल फांस ते बांचा होई ॥ टे० ॥ दत्तात्रेय भरम नहि जाना मिथ्या स्वाद भुलाना । सलिला मथके घृतिको काब्यो ताहि समाधि समाना ॥ गोरख पवन रखै नहि जाना जोग जुगति अनुमाना । रिद्धि सिद्धि संजम