कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथी
बहुतेरा पारब्रह्म नहि जाना ॥ बसिष्ठ सिष्ठ विद्या सम्पूर्ण राम ऐसे शिष्य साखा । जाहि रामको करता कहिये तिनहुंको काल न राखा ॥ हिन्दू कहै हमै ले जरवै तुलुक कहै मोर पीर । दूनौ आइ दीनमों झगरेँ ठाढै देखैँ हंस कवीर ॥ ९० ॥
शब्द ४७९-जो देखा सो दुखिया देखा तन धरि सुखी न देखा उदय अस्तकी बात कहत हौं ताकर करहु विवेखा ॥ टेक ॥ बाटे बाटे सब कोइ दुखिया क्या गिरही वैरागी । शुक्राचार्य दुखहीके कारन गरभै माया त्यागी ॥ जोगी दुखिया जंगम दुखिया तापसको दुख दूना । आशा तृष्णा सब घट व्यापै कोइ महल नहि सूना ॥ साच कहौं तो सबै जग खीझै झूठ कहो नहि जाई । कह कवीर तेई भै दुखिया जित यह राह चलाई ॥ ९१ ॥
शब्द ४८०-ता मनको चिन्हौ रे भाई । तन छूटै मन कहाँ समाई ॥ टे० ॥ सनक सनन्दन जयदेव नामा । अम्बरीष प्रहलाद सुदामा ॥ भक्त सही मन उनहुं न जाना । भगति हेतु मन उनहुं न ज्ञाना ॥ भरथरि गोरख गोपी चंदा । ता मन मिलि मिलि कियो आनन्दा ॥ जा मनको कोइ जान न भेवा । ता मन मगन भये शुक्रदेवा ॥ एकल निरंजन सकल शरीरा । तासे भ्रमि भ्रमि रहल कवीरा ॥ ९२ ॥
शब्द ४८१-बाबू ऐसो है संसार तिहारो ये कलि है व्यवहारा । को अब अनख सहे प्रति दिनको नाहिं न रहनि हमारा ॥ टे० ॥ सुमृति सुभाव सबै कोइ जाने हृदया तत्त्व न बूझे । निरजिव आगै सरजिव थापै लोचन कछुव न सूझे ॥ तजि अमृत विष काहे को अंचवै गांठी बांधो खोटा । चोरनको दिये पाट सिंहासन साहुनको कीन्हो ओटा ॥ कह कवीर झूठे मिलि झूठा ठगहीं ठग व्यवहारा । तीन लोक भरि पूरि रहो है नाहीं है पतियारा ॥ ९३ ॥