कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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शब्द ४८२-कहौ निरंजन कवनी वानी । हाथ पांव मुख सरवन नहीं जिह्वा का कहि जपहु हो प्रानी ॥ टेक ॥ जोतिहिं जोति जोति जो कहिये जोति कोन सहिदानी । जोतिहिं जोति जोति दे मारे तब कहं जोति समानी ॥ चार वेद ब्रह्मा निज कहिया तिनहुं न या गति जानी । कहैं कवीर सुनो हो संतो बूझहु पंडित ज्ञानी ॥ ९४ ॥
शब्द ४८३-को अस करै नगर कोतवलिया । मास फैलाय गिध रखवरिया ॥ मूस भौ नाव मंजार कंडहरिया । सोवै दाडुर सरप पहरिया ॥ बैल विलाय गाय भइ बांझा । बछवै दुहिया तिन नित सांझा ॥ नित उठि सिंह सियार सो जूझै । कविरके पद जन विरला बूझै ॥ ९५ ॥
शब्द ४८४-का कहिये रोवहुगे बहु तेरा । बहुतक गये फिरै नहीं फेरा ॥ टे० ॥ हम रोया तब तै न संभारा । गरभवासकी बात विचारा ॥ अब तैं रोया क्या तैं पाया । केहि कारन तैं मोहि रोवाया ॥ कहैं कवीर सुनो नर लोई । कालके वसहिं परी मत कोई ॥ ९६ ॥
शब्द ४८५-अछह राम जिव तेरी नाई । जन पर मेहर होहु तुम साईं ॥ टे० ॥ का मूडी भूमि शिर नाये का जल देह नहाये । खून करै मिसकीन कहावै अवगुन रहै छिपाये ॥ क्या भो वज्जू मज्जन कीन्हे का मसजिद शिर नाये । हृदया कपट निमाज गुजारे कहा भौ मक्का जाये ॥ हिंदू एकादशि चौविस रोजा मुस- लिम तीस बनाये । ग्यारह मास कहो किन टारो, एकहि माहिं समाये ॥ पूरब दिशा हरिको बासा, पच्छिम अछह मुकामा । दिलमें खोज दिलमें देखो, यहाँ करीमा रामा ॥ जो खुदाय मसजिद बसतु है, और मुलुक केहि केरा । तीरथ मूरत राम