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भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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(१२८)

कवीरपंथी-

निवासी, दुहुमें किनहु न हेरा ॥ वेद कितेब कहो किन झूठा, झूठा जो न विचारे। सब घट एक एक करि लेखे, भौ दूजा करि मारे ॥ जेते औरत मरद उपाने, सो सब रूप तुम्हारा। कवीर पोगरा अलह रामका, सो गुरु पीर हमारा ॥ ९७ ॥

शब्द ४८६-आव बे आव सुझे हरिको नामा। और सकल तजु कौने कामा ॥ टेक ॥ कहैं तब आदम कहैं तब होआ। कहैं तब पीर पैगम्बर हुआ ॥ कहैं तर जमी कहैं अशमाना। कहैं तब वेद किताब कुराना ॥ जिन दुनियामें रची मसीद। झूटे रोजा झूठी ईद ॥ सांच एक अल्लहको नामा। ताको नय नय करहु सलामा ॥ कहु घौ बिहिस्त कहाँ ते आई। किसके कहे तुम छुरी चलाई ॥ करता किरतम बाजी लाई। हिंदू तुरुक दुई राह चलाई ॥ कहाँ तब दिवस कहैं तब राती। कहैं तब किरतिमकी उत्पाती ॥ नहीं वाकि जात नहीं वाकि पांती। कहहि कवीर वाके दिवस न राती ॥ ९८ ॥

शब्द ४८७-अब कहैं चलेहु अकेले भिता। उठि किन करहु घरहुकी चिता ॥ टे० ॥ खीर खांड घृत पिंड सँवँरा। सो तन लै बाहर करि डारा ॥ जेहि शिर रचि रचि बाँधो पागा। सो शिर रतन बिडारहि कागा ॥ हाड जरे जस लकडी झूरी। केस जरे जस त्रिनकी कूरी ॥ आवत संग न जात संघाती। काह भये दल बाँधे हाती ॥ मायाके रस लेहु न पाया। अंतर जम बिलारि होय आया ॥ कहकवीर नल अजहुँन जागा। जमका मोगरामध शिर लागा ॥ ९९ ॥

शब्द ४८८-देखो लोगो हरिकि सगाई। माय धरै पुत धिया संग जाई ॥ टे० ॥ सासु ननद मिलि अदल चलाई। मादरियाके घर बैठी आई ॥ हम बहनोई राम मोर सारा। हमहीं बाप हरि पुत्र हमारा ॥ कहै कवीर हरिके बूता। राम रमेते कुकरिक पूता १०० ॥