कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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शब्द ४८९-देखि देखि जिय अचरज होई । यह पद बूझे बिरला कोई ॥ टे० ॥ धरती उलटि अकाशे जाई । चींटीके मुख हस्ति समाई ॥ विन पवने जहँ परवत ऊडे । जिया जंतु सब बिरछा बूडे ॥ सूखे सरवर उठे हिलोल । विनु जल चक्वा करे कलोल ॥ बैठा पंडित पढे पुरान । विन देखे का करै बखान ॥ कहहि कवीर जो पदको जान । सोई संत सदा परमान ॥१०१॥
शब्द ४९०-हो दारि की ले देहुँ तोहि गारी । तुम समुझ सुपंथ विचारी ॥ टेक ॥ घरहुके नाह जो अपना । तिनहुँ सो भेट न सपना ॥ ब्राह्मन औ क्षत्री बानी । तिनहुँ कहल न मानी ॥ जोगी औ जंगम जेते । आपु गये हैं ते ते ॥ कहहि कवीर इक जोगी । भरमि भरमि भौ भोगी ॥ १०२ ॥
शब्द ४९१-लोगो तुम मतिके भोरा । ज्यों पानीमें पानी मिलिगौ, ज्यों दुरि मिलै कवीरा ॥ टे० ॥ जो मैथिलको सच्चा बास । तो मरन होय मगहर पास ॥ मगहर मरे मरन नहि पावै । अनत मरे तो राम लजावै ॥ का काशी का मगहर उत्सर, (जोपै) हिरदय राम बसु मोरा । जो काशी तन तजे कवीरा, रामे कौन निहोरा ॥ १०३ ॥
शब्द ४९२-कैसे के तरो नाथ कैसे के तरो, अब बहु कुटिल भरो ॥ टेक ॥ कैसी तेरी सेवा पूजा, कैसो तेरो ध्यान । ऊपर ऊजर देखो, बग अनुमान ॥ भाव तो भुवंगम देखो, अति बिभिचारी ॥ सुरति सचान तेरी, मति तो मंजारी ॥ अतिरे विरोधी देखो, अतिरे दिवाना । छौ दरशन देखो, भेष लपटाना ॥ कहहि कवीर सुनो नल बंदा । डाइन डिम्भ सकल जग खंदा ॥१०४॥
शब्द ४९३-यह भरम भूत सकल जग खाया । जिन जिन
कवीरपंथी शब्दावली ३०