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भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

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शब्दावली

(९३७)

कलिंग शब्द उच्चारो है ॥ १९ ॥ प्रथम अकाश मृत्यु है लोका, मरण जनम का नित जहँ घोखा । सो हंसा पहुँचे सत लोका, जिन सतगुरु नाम उच्चारो है ॥ २० ॥ चौदह तबक किया निरवारा, अब नीचेका कहों सुनो विचारा, सात तबक में छः रखवारा । भिन भिन सुनो पसारा है ॥ २१ ॥ शेष धौल बाराह कहाई, मीन कच्छ औ कुरम रहाई । सो छः रहे सातके माहीं, यह पाताल पसारा है ॥ २२ ॥

गजल कव्वाली आरम्भ । *

कव्वाली १—मेरी नैया पडी भवसागरमें, सतगुरु इसे पार लगा देना । ये आधि औ व्याधि सतावही इनसे प्रभु मोहिँ बचा लेना ॥ मैं शिष्य तो आपका कहलाया, नहिँ करम धरम कुछ बनि आया । करुणा निधान कीजे दया, दिलसे मेरा दोष हटा देना ॥ पापी हूँ पतित मलीन हूँ मैं, सब भांति लाचार औ दीन हूँ मैं । साहब बस तेरे आधीन हूँ मैं, तारो अब चाहे जुवा देना ॥ बिनतीपे मेरी ध्यान घरो, संकटको मेरे अब बेग हरो । मेरे शुद्ध अचार विचार करो, मेरी बिगडी समयको बना देना ॥ सतज्ञान प्रदान मुझे करदो, बल बुद्धी दै निरभय करदो । मेरे पापोंको परलय करदो, मुझे कदमोंमें अपने बुला लेना ॥ दुख हरन तुम्हारा नाम भि है, भगवानको आपसे काम भि है, । जहाँ क्लेश तहाँ आराम भि है, इनसे परे मोक्ष दिला देना ॥ १ ॥

कव्वाली २—दीन दयाल दया करके मुझे चरण की शरण बुला

  • यहाँसे लेकर अगले चार गजल कव्वाली इन्दौर कबीर मंदिरके सेवक भगवान प्रसादका बनाया है ।