कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथी-
लेना। खट खट झंझट इस दुनियाकी, बिलकुलही मेरी छुड़ा देना॥ मुझे कर्म कुलालने है घेरा, चोरासी योनिनमें गेरा। अब मिला है नरतनमें डेरा, इससे प्रभु पार लगा देना॥ शुद्ध अंतःकरण होवे मेरा, नित उठ मैं ध्यान घरहं तेरा। हे नाथ यही चाहता चेरा, मुझे ऐसीही बुद्धी सदा देना ॥ चित चंचल निश्चल हो जावे, गुरु जिससे पूजा पाठ कुछ बन आवे। सब विषय भोगसे अलगावे, मेरे मनको शुद्ध बना देना॥ मेरे कार्य्य न कोई पापके हो, नित भजन कीरतन आपके हो। मेरे नाश दुख त्रिप तापके हो, मेरा आवागमन मिटा देना॥ मुझे अहंकार एक आपका हो, भगवान कहें नजर आपका हो। मेरा सुमिरन अजपा जापका हो, मुझे अपनेमें आप मिला लेना ॥ २ ॥
कव्वाली ३-मेरी विनय सुनो करूना निधान, मुझे चरणोंका दास बना लेना। मैं फंसा मोह पापमें आन, कर कृपा जरा सुलझा देना॥ कर कृपा आपने दी काया, शुभ कार्य्य करनेको फरमाया। नहीं मुझसे कुछ भी बन आया, इस दोषको मेरे भुला देना॥ निशि दिन मैं कहूंगा भजन तेरा, ये वादा है बेशक मेरा। यहाँ आतेही मोहने घेरा, जिससे दुःख पड़ा सदा सहना॥ हूँ महामूर्ख अवगुनकी खान, विषयोंसे लीन पापी महान। कर दया दृष्टि दो भक्ति दान, मेरे मनका मैल छुड़ा देना॥ तुम्हें नेति२ कहें चारों वेद, नहीं ऋषी सुनी कोई पाता भेद। ये सुनके मुझे है बड़ा खेद, मेरे संशयको नाथ मिटा देना॥ व्याकुल हो टेरता तुम्हें भगवान, होकर दयाल दो दरस आन। मुझे दीन दुखी मति हीन जान, कहि चितसे न अपने भुला देना ॥ ३ ॥ अरे मान मान मन मूठ मान, मुझे भजन प्रभूका करने देना।