कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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(१३९)
क्यों करे रात दिन परेशान, जरा भवसे सुझे तरने देना ॥ पड़ तेरे संग अती दुख पाया, तूने जहाँ तहाँ सुझे भटकाया । अब हुई कुछ उस प्रभूकी दाय़ा, सुझे ध्यान उसीका धरने देना । है चित चंचल बड़ा बेइमान, पल २ में रचे नित नयी तोफ़ान । नहीं धरन देत मोहि नेक ध्यान, उसको भा सुझे हरने देना ॥ लिया अंतःकरणको मैंने जान, जहाँ वसेहो तुम सब आनआन । है बुद्धी बिचारी अभी नदान, जरा विवेकमें इसे परने देना ॥ मेरेही बल बने पहलवान, मेराही बुरा चाहते हैवान । अभी तोड़ दूंगा मैं सबका मान, नहीं कार्य्य मेरा सरने देना ॥ भगवान दास गुरु ज्ञान पाप, ये खुदी करन लगते सहाय । विन भगती सदा जीव गोते खाय, सुझे चरन गुरुके पड़ने देना ॥ ४ ॥
इति गजल कव्वाली ।
अथ सुआ बत्तीसी प्रारम्भः ॥
(मय्या भगवती दासके बह्मबिलाससे)
दोहा-नमस्कार जिन देवको, करों दुइ कर जोर । सुवा बत्तीसी सुरस मैं, कहुँ अरिन दल मोर ॥ १ ॥ आतम सुआ सु गुरु बचन, पढत रहै दिन रैन । करत काम अघरीतिके, यह अचरज लख नैन ॥ २ ॥ सुगुरु पढावे प्रेमसो, यह पढत मन लाय । घटके पट जो ना खुले, सबहिँ अकारथ जाय ॥ ३ ॥ (साखी-गुरु विचारा क्या करे, शिष्यहिमें है चूक । शब्द बान बेधे नहीं, बाँ बजावे फूँक ॥ गुरु विचारा क्या करे, कहै न खुले कपाट । स्वान चौक बैठायके, फिरि फिरि ऐपन चाट ॥)
बीजक ॥