कादम्बरी (पूर्वार्ध - चन्द्रकला-विद्योतिनी संस्कृत-हिन्दी टीका)
Kadambari (Purvardha) with Sanskrit-Hindi Commentary
बाणभट्ट / पं. कृष्णमोहन शास्त्री द्वारा
पृष्ठ 107, कुल 709 में से
संदर्भ में पढ़ें| ५८ | कादम्बरी- | [कथामुखे- |
|---|
श्यामला अनेकशतह्रदालङ्कृता च, चन्द्रमूर्त्तिरिव सततमृक्षसार्थानुगता हरिणाध्यासिता च, राज्यस्थितिरिव चमरमृग-बालव्यजनोपशोभिता समदगजघटा-परिपालिता च, गिरितनयेव स्थाणुसङ्गता मृगपतिसेविता च, जानकीव प्रसूतकुशलवा निशाचरपरिगृहीता¹ च, कामिनीव चन्दन-मृगमदपरिमलवाहिनी रुचिरोगुरु-तिलकभूषिता च, सोत्कण्ठेव विविधपल्लवा-
प्रावृदिति। प्रावृट् वर्षा समय इव, घनैर्मेघैः श्यामला कृष्णवर्णा तथा अनेकाभिः शतह्रदाभिः तडिद्भिः अलङ्कृता मण्डिता, पक्षे—घना वृक्षादिभिः सान्द्रा चासौ अत एव श्यामला अत्यन्तकृष्णा तथा अनेका भिन्नाभिन्नस्वरूपाः शतह्रदा जलबालिकाः ताभिः अलङ्कृता।
चन्द्रेति। चन्द्रस्य मूर्त्तिः शरीरमिव, सततं निरन्तरम् ऋक्षाणि ताराः तेषां सार्थः समूहः तेन अनुगता परिवेष्टिता, हरिणेन मृगचिह्नेन अध्यासिता आश्रिता। पक्षे—सततम् ऋक्षा भल्लूकाः तेषां सार्थः समुदायः तेन अनुगता व्याप्ता, हरिणैर्मृगैः अध्यासिता।
राज्येति। राज्यस्थितिः राज्यमर्यादा इव, चमरमृगाणां बालाः चामराणि व्यजनानि तालवृन्तानि च तैरुपशोभिता, तथा समदाभिः मदेन सह वर्त्तमानाभिः गजघटाभिः करिम्मण्डलैः परिपालिता परिरक्षिता। पक्षे—चमरमृगाणां बाला लोमान्येव व्यजनानि तैः तथोक्तैः 'व्यजनं तालवृन्तकम्' इत्यमरः, अन्यत्पूर्ववदेव।
गिरिनि। गिरितनया हिमाचलसुता पार्वती तद्वदिव स्थाणुना रुद्रेण 'स्थाणू रुद्र उमापतिः' इत्यमरः, सङ्गता मिलिता, तथा मृगपतिना बाहनीभूतसिंहेन सेविता वाहनेन शुश्रूषिता, पक्षे—स्थाणुभिः शाखापत्रादिशून्यतरुभिः सङ्गता, तथा मृगपतिभिः सिंहैः सेविता आश्रिता।
जानकीति। जानकी मैथिलात्मजा सीता तद्वदिव प्रसूतौ गर्भाद्विसृक्तौ कुशलवौ नक्षामकसुतौ यथा सा तथोक्ता, निशाचरेण लङ्काधिपतिना रावणेन परिगृहीता पञ्चवटीतोऽपहृता, पक्षे—प्रसूता जनिताः कुशानां बर्हिषां लवा अङ्कुरा यस्यां सा तथोक्ता, निशाचरैः उल्कादिपक्षिभिः परिगृहीता आश्रिता।
कामिनीति। कामिनी शृङ्गारनायिका तद्वदिव, चन्दनानुलेपन-मृगमदानुलेपनाभ्यां परिमलं सौगन्ध्यं वहति धारयतीत्येवंशीला तथा रुचिरागुरुणा सुन्दरकाकतुण्डसौगन्ध्येन तिलकेन भालपट्टादौ सिन्दूरादिपुण्ड्रकेन भूषिता अलङ्कृता, पक्षे—चन्दनानां वृक्षाणां मृगमदानां कस्तूरीणाञ्च सम्बन्धात् परिमलं सौगन्ध्यं वहति खनिस्वादाधारत्वाच्च दधातीत्येवंशीला, तथा रुचिराभ्यां मनोहराभ्याम् अगुरुतिलकाभ्याम् आमोदितरुविशेषपुष्पतहविशेषाभ्यां भूषिता शोभिता।
सोत्कण्ठेति। सोत्कण्ठा कान्तप्राप्तिसमुत्सुका नायिका तद्वदिव, विविधानाम् अनेकप्रकाराणां पल्लवानां किसलयानाम् अनिलैः पवनैः वीजिता सहचरीभिः मदनव्यथापनोदाय स्पर्शिता, पक्षे—स्वभावतः स्पृष्टा च, मदनेन कामेन मदनैः तदाख्यतरुविशेषैश्च सह वर्त्तमाना संयुक्ता।
वेला के समान प्रतीत होती थी, कहीं अत्यन्त घने वृक्षों की नीलिमा के बीच-बीच निर्मल जल से भरी अनेक तलरियाँ सुशोभित थीं जिससे वह बिजलियों से युक्त काले बादलों की घटा के समान प्रतीत होती थीं, कहीं रींछों का आवागमन होता रहता था और कहीं हरिण चौकड़ियाँ भरा करते थे जिससे वह नक्षत्रों से घिरी और मृग के चिह्नों से सुशोभित चन्द्रमा की मूर्ति के समान प्रतीत होनी थी, कहीं पूँछ डुलाती हुई चँवरी मृगियाँ घूमती रहती थीं और कहीं मतवाले हाथियों की कतारें खड़ी रहती थीं जिससे वह ऐसी प्रतीत होती थी मानो चँवरों से सुशोभित और हाथियों से रक्षित राज्य की मर्यादा हो, कहीं ठूंठे वृक्षों के बीच सिंह घूमते रहते थे जिससे वह भगवान् शंकर के साथ-साथ घूमने वाली सिंहवाहिनी भगवती पार्वती के समान सुशोभित होती थी, कहीं की भूमि कुशों के अंकुरों से ढकी हुई थी जिनमें उल्लुओं ने अपना बसेरा बना रखा था जिससे वह कुश-लव को जन्म देने वाली रावण के फन्दे में पड़ी देवी जानकी के समान प्रतीत होती थी, कहीं चन्दन और कस्तूरी की गन्ध उठती रहती थी और कहीं अगर और तिलक के अनेक वृक्ष उगे थे जिससे वह ऐसी प्रतीत होती थी मानो चन्दन और कस्तूरी का लेप किये हुये अगर का तिलक लगाने वाली कोई सुन्दरी हो, कहीं मन्द-मन्द वायु में पल्लव हिलोरें लेते रहते थे और कहीं मदन के अनेक वृक्ष लगे थे जिससे वहाँ अत्यन्त शीतलता छायी रहती थी, इसलिये वह ऐसी प्रतीत होती थी मानो किसी कामातुरा उत्कण्ठिता नायिका पर पल्लवों का पंखा झल
१. पतिगृहीता ।
२. कृष्णागुरु...।
३. सोत्कण्ठवनितेव ।