कादम्बरी (पूर्वार्ध - चन्द्रकला-विद्योतिनी संस्कृत-हिन्दी टीका)
Kadambari (Purvardha) with Sanskrit-Hindi Commentary
बाणभट्ट / पं. कृष्णमोहन शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३४ कथासार
महर्षिने उत्तर दिया—'यह शापवश शुकके रूपमें आया है । नित्य-कृत्य से निवृत्त होनेपर इसकी पूरी कथा आप लोगों से कहूँगा, जिसे सुनते ही इसे अपने पूर्व जन्मका स्मरण हो जायगा ।'
यह कह कर वे नित्य-कृत्यके लिए चले गये । समस्त कृत्य समाप्त होने के बाद तपस्वियोंने उनसे मेरी कथा सुनानेकी प्रार्थना की । तब उन्होंने इस प्रकार वर्णन किया ॰
'रत्नाकर नामक नगरमें ज्योतिष्प्रभ नामका अत्यन्त प्रतापी चक्रवर्ती राजा था । उसके उग्र तपसे भगवान् आशुतोष प्रसन्न हो गए । उनकी कृपासे उसकी रानी हर्षवती के गर्भसे एक पुत्र उत्पन्न हुआ । गर्भिणी रानीने स्वप्नमें चन्द्रमाको अपने मुखमें घुसते हुए देखा था, इसलिए राजाने उसका नाम सोमप्रभ रक्खा ।
सोमप्रभ जब समस्त विद्याओं और कलाओंमें निपुण हो युवा हो गया तो पिताने उसे युवराज पद पर अभिषिक्त कर प्रभाकर नामक अपने मन्त्रीके पुत्र प्रियङ्कर को उसका मन्त्री बना दिया । उसी समय मातलि एक अश्व लेकर आकाशसे उतरा । उसने समीप आकर सोमप्रभसे कहा—'आप पूर्वजन्ममें इन्द्रके मित्र विद्याधर थे । उसी प्रेमके कारण इन्द्रने 'उच्चैःश्रवा' का पुत्र यह अश्वश्रवा घोडा आपके लिए भेजा है । इस पर आरूढ़ होनेपर आपको कोई भी शत्रु जीत नहीं सकेगा ।'
उस अश्वको देकर मातलि चला गया । दूसरे दिन सोमप्रभ ने अपने पितासे निवेदन किया—'पिताजी ! क्षत्रियों का यह धर्म नहीं कि विजय की अभिलाषा न करें और स्वस्थ हो अपने स्थान पर ही बैठे रहें, इसलिए मुझे दिग्विजययात्रा के लिए आदेश दीजिये ।'
पिताने प्रसन्न होकर दिग्विजय की सारी तैयारी करनेका आदेश दिया और और शुभ मुहूर्त्तमें उसे प्रस्थान कराया ।
सोमप्रभ ने उस दिव्य घोड़ेके प्रभावसे समस्त दिशाओंके समस्त राजाओं को जीत उनसे अनेक प्रकार के रत्न उपहार में पाये । लौटते समय उसने हिमालयके निकट सैन्यसमेत डेरा डाल दिया । वह उसी दिव्य घोड़े पर चढ़ कर वनमें शिकार खेलनेके लिए निकल पड़ा । मार्ग में एक मणिमय-किन्नर को देख कौतुकवश उसे पकडनेके लिए उसने शीघ्रतासे अपने घोड़े को दौड़ाया । किन्नर तो पर्वत की गुफामें तिरोहित हो गया, किन्तु सोमप्रभ को वह घोड़ा बहुत दूर तक ले गया । इतने में भगवान् सूर्यनारायण भी अस्त हो गये ।
सोमप्रभ अत्यधिक श्रान्त हो गया और लौटने का विचार कर ही रहा था कि उसे एक विशाल सरोवर दिखाई पढ़ा । उसीके तट पर रात्रि बितानेके विचारसे वह घोड़ेसे उतरा और उसे घास और जलसे सन्तुष्ट किया । स्वयं भी मधुर फल खाकर और जल पीकर वहीं कोमल पत्ते बिछा उसने विश्राम किया । उसी समय उसे अकस्मात् सुमधुर गीतों की ध्वनि सुनाई पटी । वह तत्काल उठा और जिस ओरसे ध्वनि आ रही थी, उसी ओर कुछ दूर चल गया । उसने देखा—एक देवालयमें भगवान् शङ्करके लिङ्गके समक्ष एक दिव्य कन्या गान कर रही है । उसने विस्मय-पूर्वक मनमें विचार किया कि यह रूपवती कौन है ? गीत समाप्त होनेपर कन्याने सत्कार-पूर्वक उससे पूछा—'आप कौन हैं ? किस प्रकार और किस प्रयोजनसे इस दुर्गम स्थानमें पधारे हैं ?'
सोमप्रभने अपना सारा वृत्तान्त कह सुनाया और पूछा—'आप कौन हैं ? इस निर्जन वनमें अकेली क्यों रहती हैं ?'
कन्याने आंसुओं की झटी लगाते हुए कहा—'महाभाग ? मुझ अभागिनीका वृत्तान्त सुननेसे क्या लाभ ? फिर भी यदि आपको कुतूहल है तो सुनिए :
'हिमालय पर काञ्चनाभ नामक नगरमें विद्याधरों का राजा पद्मकूट है । उसकी हेमप्रभा-नामक रानी, के गर्भसे मैं उत्पन्न हुई हूँ । मेरा नाम मनोरथप्रभा है । मैं अपनी सखियोंके साथ आश्रमों, द्वीपों, पर्वतों, जङ्गलों और उपवनोंमें क्रीड़ा कर भोजनके समय पिताके निकट आ जाया करती थी । एक बार जब मैं इस सरोवर में तट पर विहार करने के लिए आई तो एक मुनिपुत्र अपने मित्र सहित मुझे यहीं दिखाई पड़े । उनके सौन्दर्य की शोभा देख वशीभूत हो मैं धीरे-धीरे उनके समीप चली गई । उन्होंने भी मुझे प्रेममय दृष्टिसे देखा । मेरी सखीने हम दोनों का अभिप्राय जान मुनिपुत्रके मित्रसे पूछा—'महाभाग ! आप कौन हैं ?' उन्होंने कहा—'सुमुखि ! यहाँ से थोड़ी दूर तपोवनमें दीधिति नामक मुनि रहते हैं । एक समय वे इसी सरोवर में स्नानार्थ आए । उसी समय लक्ष्मी देवी भी उपस्थित हो गई । देवीने उन्हें देख कर मनमें सङ्गम की अभिलाषा की, इसलिए उन्हें तत्काल मानस-पुत्र उत्पन्न हुआ । देवीने