कादम्बरी (पूर्वार्ध - चन्द्रकला-विद्योतिनी संस्कृत-हिन्दी टीका)
Kadambari (Purvardha) with Sanskrit-Hindi Commentary
बाणभट्ट / पं. कृष्णमोहन शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकथासार ३५
बालक को मुनिके कर-कमलोंमें समर्पित करते हुए कहा—'यह आप के ही दर्शनसे उत्पन्न है, इसलिए आपका पुत्र है।' वह अलक्षित हो गई। मुनिने भी अनायास मिले इस पुत्र का नाम रश्मिमान् रखा और चूड़ाकरण, यज्ञोपवीत आदि संस्कारों को विधिवत् सम्पादन करके उसे समस्त विद्याओं की शिक्षा दी ये वही मुनि-पुत्र 'रश्मिमान्' हैं, मेरे साथ यहाँ भ्रमण करने आये हैं।'
उन्होंने मेरी सखीसे मेरा नाम और वंश पूछा। जब मैं उस मुनिपुत्रके निकट बैठी थी तो घरसे एक सखीने आकर मुझसे कहा-'शीघ्र चलो, पिता भोजनके लिए तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहे हैं।' उस मुनिपुत्र को वहीं छोड़ मैं भयभीत हो पिताके समीप चली गई। भोजन कर ज्यों ही बाहर निकली त्यों ही मेरी पहली सखीने कहा—'मुनि-पुत्र का मित्र बाहर उपस्थित है। वह कहता है कि मुझे रश्मिमान्ने अपने पिता द्वारा उपदिष्ट हुई आकाशगामिनी-विद्या देकर 'मनोरथप्रभा' के निकट भेजा है और यह सन्देश बतलाया है कि 'कामदेवने ऐसी भीषणदशा उपस्थित कर दी है कि अब मैं तुम्हारे बिना क्षण भर भी जीवित नहीं रह सकता।' सुनते ही मैं सखीको साथ लेकर यहाँ आई, किन्तु मेरे पहुँचनेके पहले ही चन्द्रोदय होने पर मेरे वियोग से मुनिपुत्र यह असार संसार छोड़ परलोक सिधार गये थे। उन्हें मृत देख कर मैंने उनके साथ अपने को भी भस्म करना चाहा, किन्तु उसी समय एक अत्यन्त तेजस्वी पुरुष आकाशसे उतरा और उस शरीर को लेकर चला गया। मैं अकेली ही अग्निमें भस्म होनेके लिए उद्यत हुई, तो आकाशवाणी हुई कि 'वत्से ! इस प्रकार साहस न करो, कुछ ही काल बाद इस मुनिपुत्रसे पुनः तुम्हारा अवश्य समागम होगा।' आकाशवाणी सुन कर मैंने अनुगमनका विचार छोड़ दिया और समागम की प्रतीक्षामें मैं वही रहने लगी। तभीसे यहाँ भगवान् शङ्करके भजन-पूजनमें सर्वदा लगी हूँ। मुनिपुत्र का वह मित्र भी कहाँ गया, इसे अबतक न जान सकी हूँ।'
यह वृत्तान्त सुन 'सोमप्रभ'ने पूछा—'तुम्हें अकेली छोड़कर तुम्हारी वह सखी कहाँ चली गई !' प्रत्युत्तरमें मनोरथप्रभा ने कहा—'विद्याधरोंके अधिपति महाराज सिंहविक्रम की एक बड़ी सौन्दर्यवती कन्या है। उसका नाम मकरन्दिका है। वह मेरी प्राणसे भी अधिक प्रियतमा सखी है। मेरे ही दुःखसे दुःखित होकर उसने अब तक अपना पाणिग्रहण नहीं किया है। उसने अपनी सखीको मेरे समीप कुशल पूछनेके लिए भेजा था। इसलिए मैंने भी उसीकी सखीके साथ उसे देखनेके लिए अपनी सखीको भेजा है अतएव आज यहाँ मैं अकेली हूँ।'
मनोरथप्रभा यों कह ही रही थी कि इतनेमें उसे आकाशसे उतरती उसकी सखी दिखाई पड़ी। समक्ष उपस्थित होने पर उसने मकरन्दिकाका सब समाचार पूछ सोमप्रभ के लिए कोमल पत्तों की शय्या बिछवायी और उसके घोड़ेके खानेके लिए घास डलवा दिया। उन लोगों ने उसी देवालय में वह रात्रि बितायी। प्रातःकाल देवजय नामक विद्याधर राजाका सन्देश लेकर उपस्थित हुआ। प्रणाम करके उसने मनोरथप्रभा से कहा—'राजकुमारी, राजा सिंहविक्रम ने यह सन्देश भेजा है कि जब तक तुम्हारा पाणिग्रहण नहीं होगा, तब तक तुम्हारी प्रियसखी मकरन्दिका भी अपना पाणिग्रहण नहीं करना चाहती। इसलिए तुम यहाँ आकर उसे समझाओ कि आपना पाणिग्रहण कर ले।' मनोरथप्रभा वहाँ जानेके लिए उद्यत हुई। सोमप्रभ ने कहा—'शुभे ! मैं विद्याधरोंका लोक देखना चाहता हूँ, जाने योग्य समझिये तो मुझे भी साथ ले चलिए। मेरा घोड़ा जब तक मैं लौट नहीं आता तब तक यहीं बँधा रहेगा, इसके आगे खानेके लिए घास डाल देता हूँ।' मनोरप्रभा ने सोमप्रभ को देवजयकी गोदमें बिठा कर अपने साथ ले लिया और दिव्यशक्ति द्वारा विद्याधरोंके लोकमें पहुँच गई। वहाँ मकरन्दिकाने प्रियसखी का उचित सत्कार किया। साथमें सोमप्रभको देख वह उसका समाचार पूछने लगी। मनोरथप्रभाने उसका समस्त वृत्तान्त यथावत् सुना दिया। सुन कर मकरन्दिका उसे पर आसक्त हो गयी, सोमप्रभ भी लक्ष्मी समान अतिसौन्दर्यवती मकरन्दिकाको देखकर आसक्त हो गया। वह आश्चर्य के साथ विचार करने लगा कि यह लावण्यवती किस धन्य युवाके साथ पाणिग्रहण करेगी।
तदनन्तर एकान्तमें मनोरथप्रभाने मकरन्दिकासे विवाह न करने का कारण पूछा। प्रत्युत्तरमें उसने कहा—'सखि ! अभी तो तुमने भी अपने लिए वर स्वीकार नहीं किया है, फिर मैं कैसे अपना विवाह कर सकती हूँ ? तुम मुझे प्राणों से भी अधिक प्यारी हो।' मकरन्दिकाके प्रेम-युक्त वचन सुन मनोरथप्रमाने कहा—