कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१५८ ६०८३ श्रीकालिका पुराण ६०८३ हैं, जो सृष्टि, स्थिति और अन्न की शक्ति हैं वह माया हम पर प्रसन्न होवें। मार्कण्डेय मुनि ने कहा-महामाया योगनिद्रा यह उस समय में सुरों के द्वारा संस्तुता है वह शीघ्र ही भगवान हर के हृदय से निकली थी। उसके विनिःसृत होने पर उसमें मधुसूदन ने प्रायदेश किया था। विश्व के रूप को धारण करने वाले भगवान ने स्वयं उन शम्भु की शान्ति के लिए ही उनके अन्दर प्रवेश करके कल्प-कल्प में ऐसे हो गये थे और अच्युत प्रभु ने सृष्टि, स्थिति और अन्त को वैसा ही दिखला दिया था जिस रीति से उनकी सती जाया हुई और वह जो जिसकी पुत्री हुई 'थी तथा जैसे सती युक्त देह वाली हुई थी वह सभी दिखला दिया था। बाहर व्यक्त हुआ प्रपञ्च और बहुत रजोगुण और पर ज्योति को दिखलाकर फिर उस समय में उनको योग चित्त वाला कर दिया था। फिर भगवान शंकर ने भी अनेक बार उन समस्त प्रपञ्चों का भक्षण करके उस समय में उन्हें निःसार मानकर सार वस्तु में ही चित्त को निवेशित किया था। उस समय में ब्रह्मा आदि देवों की माया उनके द्वारा परितुष्टित होकर और कर्त्तव्य की प्रतिज्ञा करके वहाँ पर ही शीघ्र अन्तर्धान हो गई थी। बैकुण्ठ नाथ भगवान भी पद में भगवान शम्भु के चित्त को संयमित करके रवि मण्डल से राजा की ही भाँति शरीर से निकल गये थे। उस समय ब्रह्मा और नारायण प्रभृति समस्त देव कृतकृत्य अर्थात् सफल हो गये थे और प्रीति से युक्त होकर गिरि पर हर को छोड़कर अपने-अपने स्थान को चले गये थे। ध्यान में समास्त महादेव जी को प्रणाम करके इन्द्र आदि सुगण मौनधारी देव को विज्ञापन करके अपने-अपने स्थान को चले गये थे। उन देवों के चले जाने पर वृषभ के वाहन वाले शम्भु दिव्यमान से एक सहस्र वर्ष पर्यन्त परज्योति के ध्यान में संलग्न हो गये थे। ऋषियों ने कहा-भगवान् मधुरिपु ने कैसे शम्भु के हृदय में शीघ्र प्रवेश करके कल्प-कल्प में सृष्टि, स्थिति और संयम को दिखलाया था। जिस तरह से रजोगुण के द्वारा जगत् के