भारतकोश
कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 169, कुल 442 में से

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पृष्ठ 169

६०४ श्रीकालिका पुराण ६०४ १७१ से यह चन्द्रवंश हुआ । उस चन्द्रवंश से यह सम्पूर्ण जगत व्याप्त हैं और वह इसका ही सर्ग कीर्त्तित किया गया है । अथर्वाङ्गिरस के दस पुत्र और बहुत से दूसरे पौत्र हुए । जो भी मन्त्र और तन्त्र आदि हैं वे सब अंगिरस कहे गए हैं । पुलस्त्य का प्रतिसर्ग है जो बल और वेग से समन्वित था । काक्रदेव, गज, अश्व आदि बहुत अधिक प्रजा हुई थी । यह सर्ग प्रलह ने किया था अर्थात् इसकी सृष्टि की थी । अतएव यह इसका ही सर्ग कहा गया है । क्रतु ऋषि के बालखिल्य पुत्र हुए थे जो सभी कुछ के ज्ञान रखने वाले और परमाधिक तेज से संयुक्त थे । ये अट्ठासी हजार थे जो कि जाज्वल्यमान सूर्य के ही समान हुए थे । प्रचेता के जो सब पुत्र हुए थे वे सब प्राचेतस इस नाम से प्रथित हुए थे । ये छियासी हजार संख्या में थे और अग्नि के सदृश तेजस्वी हुए थे । वशिष्ठ ऋषि के सुत सुकालिन थे और दूसरे योगी थे । ये अरुन्धती से समुत्पन्न पचास आरुन्धतेय कहलाये थे । यह वशिष्ठ अर्थात वशिष्ठ मुनि का सर्ग कहा जाया करता है । भृगु ऋषि से जो उत्पन्न हुए थे जो दैत्यों के पुरोहित थे । वे कवि और बहुत विशाल बुद्धि वाले हुए थे । उनसे यह सम्पूर्ण जगत व्याप्त है । नारद से तारकों ने जन्म प्राप्त किया था तथा विमान हुए थे एवं अन्य प्रश्नोत्तर से नृत्य, गीत और कौतुक हुए थे । इन दक्ष और मरीचि आदि ने दाराओं के ग्रहण करने वाले बहुत से पुत्रों का समुत्पादन कर, इस पृथ्वी को और देवलोक को पूरित कर दिया था । उनके सबके पुत्रों को भी पुत्र हुए और फिर उन पुत्रों के भी पुत्र हुए थे । ये समुत्पन्न पुत्र आज भी भुवनों में प्रवृत्त हो रहे हैं । भगवान् विष्णु की आँखों से सूर्यदेव और मन से चन्द्रमा का उत्पन्न होना बताया गया है । श्रोत से वायु समुद्भव हुआ था तथा भगवान विष्णु के मुख से अग्नि ने जन्म प्राप्त किया था । यह प्रतिसर्ग विष्णु है । उसी भाँति दश दिशाएँ भी हुई थीं । पीछे सृष्टि की रचना करने के लिए चन्द्रमा अग्नि नेत्र से अवतरित हुआ था । भगवान भुवनभास्कर कश्यप से समुत्पन्न हुए थे जो भार्या के संयुत थे ।