कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१७२ 卐 श्रीकालिका पुराण 卐 बहुत से रुद्र उत्पन्न हुए और चार प्रकार के भूतग्राम हुए थे । शृगाल, वाराह और उष्ट्र रूप वाले प्लव, गोमायु, गोमुख, रीछ मार्जर के मुख वाले थे तथा दूसरे सिंह और व्याघ्र के मुख वाले थे । सभी अनेक प्रकार के शस्त्रों के धारण करने वाले थे तथा विभिन्न और अनेकों रूप वाले थे एवं महाबल से युक्त थे । हे द्विज श्रेष्ठों ! यह प्रतिसर्ग आपको बतला दिया गया है । अब दैनन्दिन अर्थात् दिनों दिन में होने वाली प्रलय को कल्प शेष से आप लोग श्रवण कीजिए । सृष्टि कथन मार्कण्डेय मुनि ने कहा-यह मन्वन्तर मनु का काल होता है जितने पर्यन्त वह मनु प्रजाओं का पालन किया करता है वह एक ही मनु होता है और वह काल मन्वन्तर इस नाम से प्रसिद्ध होता है । यह देवों के इकहत्तर युगों से यहाँ पर होता है । तात्पर्य यह है कि एक मन्वन्तर में अर्थात् एक ही मनु के काल में देवगणों के इकहत्तर युगों का समय हुआ करता है ऐसे चौदह मन्वन्तरों का एक कल्प होता है जो ब्रह्माजी का एक दिन हुआ करता है । ब्रह्माजी के दिन के अन्त में उनको सोने की इच्छा उत्पन्न होती है और फिर महामाया योगनिद्रा ब्रह्मा जी के निकट आ जाया करती है । इसके अनन्तर वे लोकों के पितामह ब्रह्माजी ने अपरिमित तेज वाले भगवान विष्णु के नाभि के पद्म में प्रवेश करके वे सुख से शयन किया करते हैं । उसके पश्चात भगवान विष्णु स्वयं रुद्ररूपी जनार्दन होकर उन्होंने पूर्व की ही भाँति सम्पूर्ण तीनों भुवनों का विनाश कर दिया था । वायु के साथ वह्नि ने महाप्रलय कालों में जैसे ही वैसे ही सम्पूर्ण तीनों जगतों का दाह कर दिया था । प्रताप से आर्त्त होकर महर्लोक के निवासी जन जनलोक को प्रयाण किया करते हैं । क्योंकि जब तीनों लोकों के दाह होने के समय उस दारुण अग्नि से जन प्रपीड़ित हो गये । इसके अनन्तर कालान्तर महामेघों जिनकी गर्जना की महाध्वनि थी, समुत्पादित करके महावृष्टि से तीनों भुवनों को आपूरित करके चलती