कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)
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थीं। उत्प्लावित हुई समस्त प्रजा एक ही क्षण में क्षय को प्राप्त हो गयी थी। प्लवमान होती हुई अर्थात् डुबकियाँ खाती हुई प्रजा सभी ओर से क्रियमाण हो गयी थीं। उस समय में बहुत ही अधिक करुण दृश्य हो गया था। मरने वाले लोग परस्पर में विलाप कर रहे थे। कुछ लोग कह रहे थे हा पिता, हा माता! हा तात! हा सुता! इस प्रकार से कहते हुए परमभीत और आर्त्त मनुष्य करुणापूर्वक विलाप कर रहे थे। जिस देश में वाराहों के साथ शरभ निपातित हुआ था यहाँ पर ही अधोभाग में गई हुई पृथ्वी पादों के वेग से विदारित हो गई थी। दूसरा पृथ्वी का प्रान्त पर्वतों के साथ उत्थित हुआ था जन लोकों में उनके प्रभञ्जनों सृजन किया था। उस समय में शरभ ने जन लोकों में संयुक्त पृथ्वी को पोत्रियों कचला भी सम्बद्धा को निःश्रेणी की ही भाँति देखा था। वह विस्मय से आविष्ट हुआ भीतर भ्रान्त एवं पीड़ित था। इसके अनन्तर पौत्रीगण वे सब पौत्राघात से युद्ध करने लगे थे तथा उन्होंने खुरों के प्रहरों के द्वारा दाढ़ों से और महान दारुण गात्र से क्षेत्रों से ही युद्ध किया था। इसके अनन्तर एक ही उस महान शरभ उन चारों पौत्रियों के साथ एक सहस्र वर्ष पर्यन्त एकान्त में दाढ़ों के अग्रभागों से, तीक्ष्ण नखों से, खुरों से, लांगुल के प्रहारों के द्वारा और महान शब्द वाले तुण्डाघातों से चारों उन पौत्रियों के साथ लड़ा था अर्थात् उसने युद्ध किया था। उनके प्रहारों से, वेगों से, भ्रमणों से और गमनागमनों से, आस्फोटितों से तथा अरावों से पृथक-पृथक देह के पातों से पाताल में समस्त पन्नग कद्रुजों के साथ विनिष्ट हो गये थे। इसके उपरान्त वे सब सागर का परित्याग करके पृथ्वी के मध्य में समागत हो गये थे। ये परस्पर युद्ध करते हुए रहे थे फिर यह पृथ्वी सम हो गई थी। शेष भगवान भी बड़े भारी यत्न से बल के द्वारा कच्छप को अवष्टब्ध करके भग्नशीर्ष वाले प्रत्यापित होते हुए बड़े दुःख के साथ इस पृथ्वी को धारण करने वाले हुए थे अर्थात् बड़ी कठिनाई से उन्होंने पृथ्वी को धारण किया था। अनन्त के वामनीभूत होने पर और पृथ्वी तल के समत्व को प्राप्त हो जाने पर सागरों के और पर्वतों के चलायमान होने के समस्त जन्तुओं