भारतकोश
कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 186, कुल 442 में से

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पृष्ठ 186

१८८ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ के विनिष्ट हो जाने पर त्रिपौत्रि शरभों के युद्धमान होने पर सागरों के द्वारा सम्पूर्ण जगत के आलुप्त होने पर उस समय में जलमय में चिन्ता से आविष्ट सुरश्रेष्ठ पितामह भगवान हरि से बोला-हे भगवान्! सुर-असुर और मनुष्यों के सहित समस्त भुवन विध्वंस हो गया है, यह पृथ्वी विशीर्ण हो गई हे और स्थावर तथा जंगम (चेतन) नष्ट हो गये हैं। देव, गन्धर्व, दैत्य, सरीसृप के ही धन वाले मुनिगण सब, हे जगतों के नाथ! इस समय में विध्वंस हो गये हैं। आप ही सबके पालन करने वाले हैं और आप ही जगत के प्रभु अर्थात् स्वामी हैं। इस कारण से आप हम सबका और इस पृथ्वी का, हे जगत् के स्वामिन्! पालन कीजिए। आप ही वाराह का शरीर हैं आप स्वयं ही इसका उपसंहार करिए। हे महाबाहो! चर और अचरों के साथ इस पृथ्वी को संस्थापित करिए। मार्कण्डेय महर्षि ने कहा- उन भगवान जनार्दन ने इस ब्रह्माजी के वचन का श्रवण करके अच्युत प्रभु ने उस समय में सबकी संस्थापना करने के लिए यत्न किया था। इसके उपरान्त भगवान हरि रोहित मत्स्य के रूप को धारण करने वाले होकर इस समय में वेदों के सहित सात मुनियों को धारण करने वाले हुए थे। वे श्रुति की रक्षा के परायण होकर जगत के हित के साधन करने के लिए सभी श्रुति के श्रेष्ठ कोविदों का धारण किया था। उन मुनियों के शुभ नाम बतलाये जा रहे हैं, उन मुनियों में वशिष्ठ, कश्यप, विश्वामित्र, गौतम मुनि और महती तपश्चर्या में संस्थित जमदग्नि तथा तप के निधि भरद्वाज मुनि थे। इन सबको अपने पृष्ठ भाग पर रखकर जल के मध्य में महान नौका में मुनीन्द्र को बिठाकर स्थित हुए थे। इसके अनन्तर शिव को सान्त्वना देने के लिए भगवान जनार्दन वहाँ पर गये थे जहाँ पर उन्होंने पौत्रियों के साथ युद्ध किया था। अति पौत्र पहनों से वराही के साथ भ्रान्त, निष्पीडित, प्याप्त (खुले) मुख से संयुत तथा श्वासों को लेते हुए हरि को देखकर समागत हुए थे वाराह ने पूर्व में होने वाली नृसिंह भगवान की मूर्ति का