कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंॐ श्रीकालिका पुराण ॐ २१३ ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ से महाभाग विधाता विष्णु और वृषभध्वज समस्त पर्वतों को यथास्थान पर स्थापित करने के लिए यह आदेश देकर फिर चले गये थे। उन्होंने मेरु, मन्दर, कैलाश और हिमवान् आदि पर्वतों में समस्त देवों के पुरों को पृथक्-पृथक् कर दिया था। इसके अनन्तर उस नौका या परित्याग करके और वसुन्धरा को अवधूत करके स्वायम्भुव मनु ने सम्पूर्ण सम्पदा के लाभ के लिए भूमि में बीजों का वपन किया था। इसके अनन्तर वृक्ष, लता, बल्ली, गुल्म और वन, शस्य धान्य उसी भाँति औषधियों, बीजकाण्ड, प्ररोह, घ्रतान और जलज अर्थात् कमल, प्रफुल्ल, अशोक और फल, कन्द तथा बल एवं सबके प्राणों की वृद्धि के लिए शाद्वल ही हुए थे। सम्पूर्ण पृथ्वी शस्यों से सम्पन्न थी। वे वृक्ष और शुभ शाद्वल जिस प्रकार के पहले देखे थे जो कि चित्त में हर्ष करने वाले मनु ने अवलोकन पहले किया था। इसके उपरान्त महायोगी नर से महत्तम तप का तपन किया था और महामति वाले नारायण ने देवों के भावन के लिए तपश्चर्या की थी। नारायण और नर ये दोनों ही परम ऋषियों के समान थे। इन्होंने अनामय अर्थात् आमय से रहित तेज से परिपूर्ण परमेश की तप के द्वारा आराधना की थी। वे जनगणों को, वेदों को और देवर्षियों व श्रेष्ठों को लाये थे जो पूर्व में मृत हुए अमर थे। उनके गणों को पृथक-पृथक उन दोनों मुनियों ने महान तप के बल से सृजन किया था। सूर्य और चन्द्र दोनों देवों को तथा दश दिक्पालों को और पाताल तल में निवास करने वालों को भगवान जनार्दन ने स्वयं ही उत्पन्न किया था। भगवान अच्युत ने सूर्य और चन्द्रमा को यथास्थान किया था अर्थात् रचना की थी। पूर्व की ही भाँति इनको योजित कर दिया था और उन दोनों को दिन और रात्रि में स्थित किया था। औषधियों से समुद्गत हो जाने पर और देवों में पृथक्-पृथक् होने पर दक्ष प्रजापति ने महान अध्वर (यज्ञ) करने के लिए प्रारम्भ कर दिया था। कश्यप, अत्रि, वशिष्ठ, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और भारद्वाज ये अमूल सात ऋषि थे। ब्रह्मा के पुत्र दक्ष प्रजापति ने इन पूर्वोक्त सप्त ऋषियों