भारतकोश
कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 218, कुल 442 में से

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पृष्ठ 218

[Header] २२० ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ को देवी के दर्शन करने के लिए स्वागत नहीं करता है। हे धरा के पुत्र! तेरे कुल में उचित कर्म क्या है ? जिसको तू कर रहा है । प्राग्ज्योतिष पुर में जाकर मैं देवी का पूजन करूँगा । मार्कण्डेय मुनि ने कहा-इसके उपरान्त उस मुनि ने कुपित होकर राजा नरक को शाप दिया था। वशिष्ठ मुनि ने कहा-हे वराह के कुल को कलंकित करने वाले! हे पापी! जिससे अभी उत्पन्न हुआ है। उसी मानुष रूप से मारण को प्राप्त होगा। तेरे मृत हो जाने पर जगतों की प्रभु महादेवी कामाख्या को मैं पूजित करूँगा। हे पापी! तुम यहाँ स्थित रहो मैं अपने निवास स्थान को चला जाऊँगा। हे पापी! जब तक जीवित रहेगा तब तक जगत् की स्वामिनी यह कामाख्या देवी भी सब परिकरों के साथ अन्तर्धान हो जावे । मार्कण्डेय मुनि ने कहा-वह ब्रह्माजी के पुत्र मुनि इतना कहकर अपने स्थान को चले गये थे। उस भूमि के पुत्र के द्वारा निरस्त किए हुए मुनि वसिष्ठ बहुत ही अधिक कुपित हो गये थे। वसिष्ठ मुनि के चले जाने पर नरक शीघ्र ही विस्मय से संयुक्त होकर नीलकूट महान् गिरि पर देवी के भवन में चला गया था। वहाँ जाकर उसने कामरूप वाली कामाख्या देवी को नहीं देखा था। उसके योनिमण्डल को और सब परिकारों को भी नहीं देखा था। इसके उपरान्त वह बहुत ही उदार हो गया था और माता पृथ्वी का उसने स्मरण किया था। नरक ने अविनाशी जगत् के नाथ प्रभु पिता का भी स्मरण किया था। हे द्विजो! उस समय वे दोनों ही उसके सामने प्रत्यक्ष रूप से प्रकट नहीं हुए क्योंकि वह समय का व्युत्क्रमण करने वाले और शम्भु के लिए नीति से विहीन हो गया था। उस समय वज्रध्वज वह विष्णु भगवान् और पृथ्वी को न प्राप्त करने वाला होकर शोक से युक्त हो अपने घर में चला गया था। अपने घर को जाते हुए भूमि के पुत्र ने अपनी पुरी को देखा था जो अपनी पूर्व की श्री से परित्यक्त थी और मलिन वनिता के ही समान हो रही थी। उस देवी के अन्तर्धान हो जाने पर उस पुर को उसने वेद-वाद से रहित और पवित्र दाराजनों के स्वल्प रह जाने वाला ही पाया था। वहाँ पर न तो देवगण जाते हैं और न