कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)
पृष्ठ 219, कुल 442 में से
संदर्भ में पढ़ें൘൘ श्रीकालिका पुराण ൘൘ २२१ प्रिय तथा महर्षि गण की जाया करते हैं। उसका नगर बहुत ही कम यज्ञों की क्रिया तथा उत्सवों वाला हो गया था। बहुत सी ईतियाँ उस समय हो गई थीं (विनाश करने वाली ६ प्रकार की ईतियाँ होती हैं) और बहुत से जन मर गये थे। उस समय में लौहित्य नदों का राजा भी बहुत कम जल वाला हो गया। उस समय बहुत से विपरीत होने वाले कार्यों को देखकर वह नरक ब्राह्मण के पुत्र के शाप से आपने आप का मरण भी आया हुआ मानने लगा था। इसके अनन्तर प्राग्ज्योतिष नगर का स्वामी नरक शोक से विह्वल चेतना वाला होकर मन से चिन्तन करता हुआ बलि के पुत्र अपने मित्र बाण के समीप में चला गया था। वह इसको प्राणों के समान रखा था। ये दोनों निरन्तर परस्पर एक दूसरे की रक्षा करने में तत्पर रहा करते थे। ये दोनों बाण और नरक स्वर्ग के वैद्य अश्विनी कुमारों के ही सदृश थे। इसी बीच शम्भु का सखा बलवान् मित्र बाण महान् बुध था और मन्त्र प्रदान के द्वारा अनुकूल रहने वाला था। इस वज्रकेतु की उस समय से ऐसी अचल मति हुई थी। उसने बाण ने नरक की ओर दीप्ति दूत को प्रेषित किया था। वह शीघ्र गमन करने वाले रथ का वृन्तात शीघ्र ही बाण के लिए निवेदन कर दिया था। जिस प्रकार से वसिष्ठ मुनि ने शाप दिया था और जैसे अम्बिका अन्तर्धान हो गई थी और जैसे प्राग्ज्योतिष नाम वाले पुर में विघ्न उत्पन्न हो गया था। भूमि और माधव का समय जिस तरह से व्यतिक्रान्त हुआ था अर्थात् समय का अतिक्रमण दिया गया था-यह सब भूमिपुत्र के उस दूत ने बलि के पुत्र बाण से कह दिया था। उसके समान आकार वाले मित्र का यह पराभव जो दैव के ही द्वारा हुआ था उसे भली भाँति जानकर वह ईश्वर नरक को समझने अर्थात् सान्त्वना देने के लिए वहाँ स्वयं ही गया। वह सुवर्ण से रचित विचित्र अंगों वाले, तीन सौ अश्वों से युक्त, लोहे के पहियों वाले, व्याघ्र, मधुर ध्वज से भूषित, सुवर्ण के दण्ड वाले सितछत्र से समाच्छादित, किंकिणी गणों से समन्वित, अनेक रत्नों से समूह से