कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)
पृष्ठ 220, कुल 442 में से
संदर्भ में पढ़ें२२२ ॐ श्रीकालिका पुराणे ॐ निर्मित महान् रथ पर वह समारूढ़ हुआ था। वह एक सहस्त्र भुजाओं वाला-श्रीमान् चतुरंगिणी सेनाओं से युक्त होकर भौम (नरक) के पुर प्राग्ज्योतिष में शीघ्र आ पहुँचा। उसके समीप पहुँचकर महाबाहु बाण ने प्राग्ज्योतिष में शीघ्र आ पहुँचा। उसके समीप पहुँचकर महाबाहु बाण ने प्राग्ज्योतिष नगर के स्वामी को पूर्व श्री से हीन मित्र को और उस नगर को देखा था। पृथ्वी के सुत द्वारा यथा उचित रीति से वह पूजित किया गया था अर्थात् उसका समुचित सत्कार किया था। और उसने पूछा था कि किस कारण से तुम्हारा यह पुर श्रीहीन हो गया था। बाण ने कहा-आपका यह शरीर भी जैसा पहले था वैसा शोभित नहीं हो रहा था। आपका मन भी पहले के समान प्रसन्न नहीं है-इसमें क्या कारण है, वही मुझे कृपा कर बतलाइये।
नरकासुर उपाख्यान
मार्कण्डेय मुनि ने कहा-इस प्रकार से बहुत से प्रश्न पूछे गये। भूमि के पुत्र उस नरक को जिस तरह से वशिष्ठ मुनि ने शाप दिया था वह सभी उसको कह दिया था। भूमि के पुत्र से जो भी सुना था वह पहले ही दूत के द्वारा आवेदित था। भूमि के पुत्र से जो भी सुना था वह उस वज्रध्वज से पुनः बोला। वाण ने कहा-आपको क्रोध नहीं करना चाहिए। शरीरधारियों को सुख और दुःख चक्र की ही भाँति परिवर्तित हुआ करते हैं अर्थात् सुख के बाद दुःख से कोई भी हीन हुआ करता है। परन्तु धीर पुरुषों को विभूति के लिए उसमें प्रतिकार करना ही चाहिए। आपको भी अब उसका प्रतिकार करना योग्य हे अर्थात् आपको भी प्रतिकार करना ही चाहिए। पृथ्वी में यह मनुष्य असाधारण विभूतियों से वर्धित होता है। ऐसा सभी को होता है चाहे कोई दानव हो दैत्य हो अथवा असुर हो, राक्षस हो अथवा किन्नर हो। इन्द्र भी उसको सहन नहीं किया करता है और जिस किसी भी प्रकार से उसकी श्री को भ्रष्ट करके उसे विनष्ट कर दिया करता है। उसके परम इष्टतम देव सनातन विष्णु भगवान् हैं। वे इन्द्र का थोड़ा सा भी अनिष्ट कभी नहीं किया करते हैं।