भारतकोश
कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 223, कुल 442 में से

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पृष्ठ 223

६०८३ श्रीकालिका पुराण ६०८३ २२५ करें। हे पितामह! ये मेरे पाँच वर हैं जो आपसे मैंने आज वरण करने की इच्छा प्रकट ही है। मार्कण्डेय महर्षि ने कहा- वह नरक माया से मोहित हो गया था और मुनि के शाप को विस्मृत कर दिया था। मुनि का शाप उसी भाँति स्थित था। उसने अन्य वरदानों की याचना की थी। पितामह ने 'ऐसा ही होवे'- ऐसी रीति से उन सब वरों को देकर यह कहा था-द्वापर के अन्त में सन्ध्या में तिलोत्तमा आदि सुर कन्याएं भूतल में तेरी पत्नियाँ होंगी। हे वृषध्वज! जब तक देवर्षि नारद तेरे पुर में नहीं जाते हैं। हे क्षिति के पुत्र! तब तक आपको उनके साथ मैथुन कर्म नहीं करना चाहिए। इतना ही कहकर सब लोकों के ईश एक ही क्षण में अन्तर्धान हो गये थे। नरक भी परम प्रसन्नता की प्राप्ति करके अपने स्थान को गया। इसके अनन्तर वह उस प्रसन्न लोगों वाले नगर को चला गया था। वह नगर श्री से निषेवित था और सदा ही उत्साह से परिपूर्ण था तथा ईतियों के विघ्नों से रहित था। वह नगर देवराज की दयिता अमरावती ही के समान पशुओं के समुदायों से ओर अश्व-गज कुम्भकों से परिपूर्ण हो गया था। बाण ने नरक को उत्तीर्ण तप वाला तथा दिये हुए वरों वाला श्रवण करके उस समय में वह वज्रध्वज के समीप में पुनःस्वयं समुपस्थित हो गया था। उस बाण ने नरक के प्राग्ज्योतिष नामक नगर में गमन करके फिर अपने मित्र नरक से तपश्चर्या का हाल पूछा। आपने तप कहाँ किया था अथवा आपने किन व्रतों को किया था। आपने किस प्रकार का वर प्राप्त किया था यह सभी आप मुझ से कहने के योग्य हैं। अब मैंने आपके पुर को सम्पूर्ण रूप से प्रसन्न जनों से संकुल देखा है। अश्व, गज और रत्नों के समूहों से तथा मंगल ध्वनियों से भरा है। आज आपके द्वारा पालन के योग्य प्रजा एवं भूमि शस्त्रों से परिपूर्ण और रोगरहित देखी जा रही है। आप बतलाइए ब्रह्माजी ने कैसे आपको वरदान दिया था ? नरक ने कहा-पर्वत के रूप को धारण करने वाले ब्रह्माजी स्वयं कामेश्वरी को धारण करने के लिए यहाँ पर अवतीर्ण हुए