भारतकोश
कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 224, कुल 442 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 224

२२६ ६०८ श्रीकालिका पुराण ६०८ थे। वहीं पर मैं अकेला जल के बाहर करने वाला सौ वर्ष तक तपस्या करने वाला रहा। लौहित्य का तट प्राण वायु से सेवित था वह परम मनोहर था और प्राणियों को सुख प्रदान करने वाला था। वहीं पर तपस्या करने में प्रवृत्त हुए मुझे सुखपूर्वक सौ वर्ष एक वर्ष की ही भाँति समागम हुए थे। इनके उपरान्त ब्रह्माजी प्रसन्न हो गये थे और प्रत्यक्ष होकर उन्होंने मेरे हित के वचन कहे। उन्होंने मेरे सामने होकर मुझ से कहा था-मैं तुझ पर प्रसन्न हो गया हूँ और जो भी तुझे अभीष्ट होगा वही पर तुझको दूँगा-तुम मुझसे वर ग्रहण कर लो। मैंने उनसे पाँच वरदानों की याचना की थी-सुर योनि से मेरी अवध्यता होवे, मेरी सन्तति कभी भी छिन्न न होवे, अजेयता मुझे प्राप्त रहे, विभूति सदा ही बनी रहे और कभी भी तेरा परित्याग न करे और परम श्रेष्ठ नवयौवन से समन्वित मेरी नारियाँ होवे, यही पाँच वरदान मैंने माँगे थे। उन्होंने भी सभी वरदानों को प्रतिश्रुत किया था और फिर वे अपने स्थान को चले गए थे। इसके उपरान्त मैं प्रसन्नता से अपने नगर में प्राप्त हो गया था। फिर मैंने मन्त्रियों में श्रेष्ठों के सहित पुनः उन नगर निवासियों को गणों के सहित दान और भोजन के द्वारा प्रसन्न किया था। मार्कण्डेय मुनि ने कहा-इस तरह उसके वचन श्रवण करके बलि का पुत्र उस क्षण प्रसन्न नहीं हुआ और उस समय उसने भूमि के पुत्र से यह वचन कहा था वह वचन उस काल के युक्त था। बाण ने कहा-हे मित्र! उस समय विधाता के आगे आपकी बुद्धि मुनि ने शाप का अतिक्रमण करने की नहीं हुई थी। यहाँ पर आपका कल्याण कैसे होगा। हे भूमिपुत्र! जो होनहार है वह नित्य ही अवश्यम्भावी है। दैव से अधिष्ठित कर्म का कारण नहीं है। जो होनहार है वह अवश्य ही होगी, उसमें ब्रह्मा भी बाधक नहीं हो सकते। इस कारण आप बहुत महान् वीर असुरों को सन्धि करके उन्हें आगे करो और मन्त्रियों के पदों पर उनको नियुक्त करो। जो देवों को भी दुरापद हों ऐसे वीरों को द्वार पर संस्थापित करो। आप यदि वरदान