भारतकोश
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कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

२२६ ६०८ श्रीकालिका पुराण ६०८ थे। वहीं पर मैं अकेला जल के बाहर करने वाला सौ वर्ष तक तपस्या करने वाला रहा। लौहित्य का तट प्राण वायु से सेवित था वह परम मनोहर था और प्राणियों को सुख प्रदान करने वाला था। वहीं पर तपस्या करने में प्रवृत्त हुए मुझे सुखपूर्वक सौ वर्ष एक वर्ष की ही भाँति समागम हुए थे। इनके उपरान्त ब्रह्माजी प्रसन्न हो गये थे और प्रत्यक्ष होकर उन्होंने मेरे हित के वचन कहे। उन्होंने मेरे सामने होकर मुझ से कहा था-मैं तुझ पर प्रसन्न हो गया हूँ और जो भी तुझे अभीष्ट होगा वही पर तुझको दूँगा-तुम मुझसे वर ग्रहण कर लो। मैंने उनसे पाँच वरदानों की याचना की थी-सुर योनि से मेरी अवध्यता होवे, मेरी सन्तति कभी भी छिन्न न होवे, अजेयता मुझे प्राप्त रहे, विभूति सदा ही बनी रहे और कभी भी तेरा परित्याग न करे और परम श्रेष्ठ नवयौवन से समन्वित मेरी नारियाँ होवे, यही पाँच वरदान मैंने माँगे थे। उन्होंने भी सभी वरदानों को प्रतिश्रुत किया था और फिर वे अपने स्थान को चले गए थे। इसके उपरान्त मैं प्रसन्नता से अपने नगर में प्राप्त हो गया था। फिर मैंने मन्त्रियों में श्रेष्ठों के सहित पुनः उन नगर निवासियों को गणों के सहित दान और भोजन के द्वारा प्रसन्न किया था। मार्कण्डेय मुनि ने कहा-इस तरह उसके वचन श्रवण करके बलि का पुत्र उस क्षण प्रसन्न नहीं हुआ और उस समय उसने भूमि के पुत्र से यह वचन कहा था वह वचन उस काल के युक्त था। बाण ने कहा-हे मित्र! उस समय विधाता के आगे आपकी बुद्धि मुनि ने शाप का अतिक्रमण करने की नहीं हुई थी। यहाँ पर आपका कल्याण कैसे होगा। हे भूमिपुत्र! जो होनहार है वह नित्य ही अवश्यम्भावी है। दैव से अधिष्ठित कर्म का कारण नहीं है। जो होनहार है वह अवश्य ही होगी, उसमें ब्रह्मा भी बाधक नहीं हो सकते। इस कारण आप बहुत महान् वीर असुरों को सन्धि करके उन्हें आगे करो और मन्त्रियों के पदों पर उनको नियुक्त करो। जो देवों को भी दुरापद हों ऐसे वीरों को द्वार पर संस्थापित करो। आप यदि वरदान

६००४ श्रीकालिका पुराण ६००४ २२७ प्राप्त किए हुए हैं तो देवेश्वर का भी अतिक्रमण करो । विधाता ने जो वर दिया है आपके लिए वह परीक्षण है । अपुत्र आपो जाया में आत्मजा को जन्म दो । इतना कहकर वाण पूजित होकर वहाँ से चला गया । नरक ने भी अपने मित्र द्वारा कहे वचनों के अनुसार ही कार्य करना आरम्भ किया । मार्कण्डेय महर्षि ने कहा- काल के सम्प्राप्त होने पर भूमि के पुत्र भगदत्त, महाशीर्ष, मदवन्त और सुमाली इन चार पुत्रों को समुत्पन्न किया था जो कि महान सत्व वाले, महान वीर्य, पराक्रम वाले और अन्य वीरों के द्वारा दुरासद थे । इसके अनन्तर वाण के वचन के अनुसार हयग्रीव तथा मुरु को बुलाकर उसके साथ सन्धि करके अपनी सेना के अधिपत्य पदों पर अभिषिक्त कर दिया था । भौम के द्वारा नियुक्त किए हुए मुरु और हयग्रीव को सुनकर उस समय में जो-जो भी भूमि पर असुर थे वे भी सब संगत हो गये । नरक के द्वारा समागत मुरु और हयग्रीव को सुनकर सेना के सहित निसुन्द और नाम वाले तथा दैत्य विरूपाक्ष उस समय में ये सभी समागत हो गये थे इसके अनन्तर उस नरक ने सेना के साथ पश्चिम द्वार पर मुरु को द्वार पर नियुक्त किया । पूर्व द्वार पर निसुन्द को और विरूपाक्ष को दक्षिण द्वार पर नियुक्त किया । मध्य में पंचजन सुन्द को सेनापति के पद पर नियुक्त किया था । मुरु, क्षुरान्त और पाशों को छः सहस्रों को योजित किया था । द्वार पर भूमि पुत्र के द्वारा पुर की रक्षा के लिए इनका सत्कार किया गया । इस प्रकार से जो पूर्व में थे तथा उससे भी पहले थे उन अच्छे मन्त्रियों को हटा दिया था । वह असुर निरन्तर असुरों ही साथ से परम प्रसन्न हुआ था । उस भूमि के पुत्र ने पूर्व में ग्रहण किए हुए भाव का परित्याग कर दिया था । वह असुर भाव प्राप्त कर देवों को बाधा दिया करता था । वह न तो देवों को, न मुनियों को और न किन्हीं की सेवा किया करता था । सुरेश्वर को शीघ्र ही उसने हयग्रीव की सहायता से जीत लिया । इस प्रकार से वह आसुर भाव को बढ़ाता हुआ ही पृथ्वी पर विचरण

किया करता था। वाण के वचन से यह हयग्रीव की सहायता से देवों के स्वामी इन्द्र को बाधा देता था और मुनियों को भी बाधा दिया करता था। देवेश को तीन प्रकार से जीतकर अदिति के दो कुण्डलों को जो तीनों लोकों में प्रसिद्ध हैं भूमि के पुत्र नरक ने मुनि के शाप से निर्भीत होकर उन कुण्डलों का हरण कर लिया था। इस तरह से देवी को, मुनियों को और विप्रों को बाधा करता हुआ उस भूमि के पुत्र ने पाँच सहस्त्र वर्ष तक प्राग्ज्योतिष में राज्य का शासन किया था। इसी बीच में महान् भार से पीड़ित हुई पृथ्वी देवी ब्रह्मा-विष्णु प्रमुख देवों की शरणागति में अपनी रक्षा के लिए गई थी। वहाँ पृथ्वी ने ब्रह्माजी और विष्णुजी को प्रणाम करके यह कहा-दानव, राक्षस और दैत्य जो हरि के द्वारा सूदित कर दिए गये थे वे सब राजाओं के मन्दिर में इस समय में बल से गर्वित होकर समुत्पन्न हो गये। उनका अधिक भार है कि उसको सहन और वहन करने में समर्थ नहीं हूँ उनकी संख्या इतनी अधिक है कि मैं उन सबकी संख्या बतलाने में भी असमर्थ हूँ और मुझे उत्साह नहीं होता है कि मैं बतलाऊँ। उनमें मुख्य महान् बल वाले आठ सौ सहस्त्र हैं। उनमें भी अत्यधिक बल है। मैं इस समय में उनका भार वहन करने में असमर्थ हूँ। वाण-बलि का पुत्र वीर कंस, धेनुक अरिष्ट, प्रलम्ब, सुनामा, मुरु, शल, मल्ल, चारण और मुष्टिक महान् बलशाली जरासन्ध, नरक, हयग्रीव, निसुन्द और सुन्द हैं। विरुपाक्ष, पाञ्चजन्य, हिडम्ब, बक, बल, जटासुर, किर्मीर, मनायुध, अलम्बुष, सौमाख्या, जरासन्ध, बानर, द्विविद, श्रुतायुध, महादैत्य शतायुध, ऋष्य, शृंग सुत, सुबाहु, अति बाहुक, कालकस्य हिरण्य पुरवासी दैत्य इन सबके पदों के क्षोभो से मैं दिनों दिन विशीर्ण हो रही हूँ। हे सुरोत्तमो! मैं लोकों का वहन करने में असमर्थ हो रही हूँ। आप इनका विनाश करिए। यदि सुरश्रेष्ठ मेरी रक्षा नहीं करोगे तो मैं परमाधिक विशीर्ण होकर इस समय अवश होकर पाताल चली जाऊँगी। इसके अनन्तर ब्रह्मा, भगवान् विष्णु और महेश्वर ने उनके वचन का श्रवण करके कि पृथ्वी के भार का विमोचन हम करेंगे ऐसा

ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ २२९ कहा था। पृथ्वी देवी को विदा करके सभी देवगण सनातन माधव को भूमि के भार के उतारने के विषय में विचार करने लगे। प्रभु ने परम प्रसन्न होकर समस्त सुरों से कहा कि वे सब भूमि भार को उतारने के लिए अपने-अपने अंशों से अवतरित होवें। इतना कहकर प्रभु स्वयं भी यहाँ पर भार के अवतारण में देवकी के गर्भ में अवतीर्ण हुए थे। स्वयं भगवान् विष्णु को अवतीर्ण जानकर, जो कि सनातन हैं, उन देवगणों ने रम्भा और तिलोत्तमा आदि देवियों को उत्पादित कर दिया था। वे सब परम श्रेष्ठ नारियाँ हिमालय के पृष्ठ भाग पर क्रीड़ा करने वाली थीं। उनको भूमि के पुत्र नरक ने देखा था और बलपूर्वक उसने हरण कर लिया। उस नरक ने उन सबको घर्षित किया था और अपने प्राग्ज्योतिष नरक में उन सबको ले आया था। नरक ने मैथुन के समय उनसे प्रार्थना की थी। उन्होंने कहा हे भौम! जब तक देवर्षि नारद तेरे नगर की ओर आते हैं तब तक आप हमारी रक्षा करें और मैथुन के प्रति हमको छोड़ देवें। वे शीघ्र ही हमारी प्रात अनुग्रह करके हे वीर! आपके समीप में आयेंगे। उनके द्वारा देखी गयीं हम सब तुम्हारे साथ संगम करने के लिए आ जायेंगी। उनके द्वारा इस प्रकार से प्रार्थना किए जाने पर नरक ने उस अवसर पर ब्रह्माजी के वाक्य का स्मरण करके 'ऐसा ही होवे' -यह उसने कहा था। इसी बीच में लोकों की रक्षा करने वाले भगवान् देवकी के गर्भ से समुत्पन्न हुए थे और नन्द के घर में पालित होकर बड़े हुए। उन प्रभु ने कंस, केशी और प्रलंब आदि अनेक दैत्यों को मार कर जल से अन्दर सागर में बसी हुई द्वारका पुरी में निवास किया। वहाँ पर उन्होंने अपने धर्म से आठ कन्याओं को स्वीकार किया था। उनमें मानवी के रूप वाली कालिन्दी थी वह रमणी, नग्नजित् की पुत्री थी। सत्या, चारुहास वाली लक्ष्मणा, परम सुशील और शील से सम्पन्न सती जाम्बवती थी। बलदेव के मित्र को इन नारियों में अनुराग करते छत्तीस वर्ष व्यतीत हो गये। हे द्विज श्रेष्ठो! उसके महान् बल वाले इस प्रकार से प्रद्युम्न, साम्ब जिनमें प्रमुख थे ऐसे पुत्र समुत्पन्न हुए थे जो शास्त्र में और शस्त्र विद्या में परम पण्डित थे।

२३० ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ उस समय जो भूमि के भार स्वरूप थे ऐसे अनेक दैत्यों को निहत कर दिया। फिर परम प्रसन्न होकर क्रीड़ा करते हुए उन्होंने द्वारका में निवास किया था। इसके अनन्तर उत्पीड़ित होकर वहाँ पर आये और द्वारका में भगवान् के दर्शन के लिए ही उपस्थित हुए। वहाँ लोकों के द्वारा वन्दित प्रभु कृष्ण का स्मरण करके उनके द्वारा पूजित होते हुए वह सुवर्ण के आसन पर विराजमान हो गये। इन्द्रदेव ने भगवान् हरि के लिए नरक का जो विकेष्टि था वह सब कह दिया था। जो पूर्व में हुआ था और उस समय में हो रहा है वह सभी इन्द्र ने निवेदन कर दिया था। हे महाबाहू! हे श्रीकृष्ण! जिस प्रयोजन के लिए मैं यहाँ आया हूँ उसका आप श्रवण कीजिए। मैं वह सभी कुछ निवेदन करूँगा। उसमें आप कुछ भी शंका न करिये। एक भूमि का पुत्र नरक नाम वाला असुर है जो सुरों का मर्दन करने वाला है। वह चिरंजीवी है और पहले भगवान् विष्णु और क्षिति के द्वारा पालित हुआ है। इस समय में क्षिति और भगवान् विष्णु की अवज्ञा करके वाण के वचन से उसने तप के द्वारा ब्रह्माजी को परितुष्ट कर लिया है। ब्रह्माजी से वरदानों को प्राप्त करके वह अत्यन्त घमण्डी हो गया है। वह इस समय ऐसा दर्पित हो गया है कि न तो उसने माधव का और न पृथ्वी का कभी स्मरण किया है। पूर्व में वह धर्मात्मा था, सुरों की अराधना की थी और वह व्रतधारी था किन्तु इस समय वह असुर भाव का आश्रय लेकर सबको बाधा दिया करता है। अदिति के अमृत से समुद्भूत दोनों कुण्डलों को मोह से उसने हरण कर लिया और देवगणों और ऋषियों को बाधा देता हुआ विप्रों के अप्रिय कर्म में वह रत रहता है। कामगामी, दुरासद वह मुझको भी नित्य बाधा देता है। वह सुरों और दैत्यों का जीतने वाला है तथा कोई भी देहधारी उसका वध करने में समर्थ नहीं है। आपका भी वह अन्तर पेक्षी है, उस पापी का भूमि की रक्षा के लिए वध कीजिए। सब देवगणों ने आपके लिए देवों और गन्धर्वों की कन्यायें पहले मुख्य पर्वत पर हिमालय में अवतारित की थीं। ये सोलह सहस्र हैं। वरदान के घमण्ड से भरे हुए

ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ २३१ पापी उसने वे सभी कन्याएँ बलपूर्वक हरण कर ली हैं। वह दुराधर्ष हैं और हयग्रीव की सहायता वाला है। सागर में भी असुरों तथा मनुष्यों का प्रमथन करके उसने लौहित्य तीर्थ के तट पर मणि पर्वत बनाया है उस पर्वत में अलका नाम वाली रम्यपुरी की रचना करके देवों और गन्धर्वों की नारियों को उसने बसाया है। वे सब एक वेणी को धारण करने वाली हैं और सम्भोग से वर्जित हैं। वे सब आपकी ही प्रतीक्षा कर रही हैं। हे कृष्ण! आप उन सबको सनाथ करें। जब तक आपके पुर में नारद मुनि आगमन करें। हे भौम! तब तक उसके साथ मैथुन करने का तुम प्रयत्न नहीं करोगे। यही दुरात्मा नरक के साथ उनकी शर्त थी। जिस समय नारद मुनि प्राग्ज्योतिष पर पहुँचे उसी समय आप नरक के हनन करने के लिए गमन करेंगे। इस कारण से उस पाप कर्म करने वाले नरक के ही सदृश नरक को मार दीजिए क्योंकि वह बहुत दुरासद है और देवों तथा मनुष्यों का कण्टक है। उसके वध कर देने से देवी पृथिवी पुत्र के शोक को प्राप्त होगी क्योंकि उसने स्वयं ही उसके वध करने के लिए देवताओं से प्रार्थना की थी। इस कारण से उस महान् पापी पुरुष नरक का वध करिए। उसका हनन करके स्त्री रत्नों को तथा अन्य रत्नों का उद्धार कीजिए। महान् आत्मा वाले इन्द्र के द्वारा इस प्रकार से जगतों के नाथ से कहा गया तो उन्होंने पृथिवी के पुत्र नरक के हनन करने के लिए प्रतिज्ञा की और उसी समय मार देने का वचन दिया था। इन्द्र के साथ भगवान् केशव ने उसके वध करने की प्रतिज्ञा कर उसी समय प्राग्ज्योतिष पुर की ओर यात्रा कर दी थी। भगवान् कृष्ण ने गरुड़ पर समारोहण किया था और उनके साथ दूसरी सत्यभामा भी थी। वे प्राग्ज्योतिष की ओर मुख करके चले गये थे और इन्द्रदेव स्वर्ग में गमन कर गये थे। देवलोक का आक्रमण करके गमन करते हुए इन्द्र और श्रीकृष्ण को जो महतीद्युति से सम्पन्न थे। यादवों ने वहाँ पर सूर्य और चन्द्र के समान ही देखा। वे दोनों गन्धर्व-देव और अप्सराओं के गणों के द्वारा स्तवन

किए हुए थे। श्रीकृष्ण और इन्द्र क्षण भर में ही आकाश में अदृश्य हो गये थे। फिर क्षण भर में ही जगत् के स्वामी गरुड़ द्वारा नरक से वशीकृत परम रम्य प्राग्ज्योतिष पुर में पहुँच गये। वह दुर्ग छह सहस्त्र भयंकर रौरव पाशों से और क्षुरान्तों से वेष्टित था और पार्श्व में मृत्यु पाशों के समान उच्छ्रिट था। उन्होंने उस पुर से उसी समय में निकलते हुए नारद को देखा था। वह देव मुनि श्रीमान् जब नरक के प्रति गये थे उस नारद को देखा था। वह देव मुनि श्रीमान् जब नरक के प्रति गये थे उस समय प्राग्ज्योतिष में गमन करके वे नारद मुनि उसके द्वारा सत्कार को प्राप्त हुए थे। उन्होंने नरक से योषितों के साथ संगम करने में उस समय कह दिया। आज चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की पञ्चमी है। हे धरापुत्र! नवमी तिथि में तुम महान् आपदाओं को प्राप्त करते हो। उस समय में चतुर्दशी में यदि ये योषितें सुस्नात हों उसी समय में तुमको सुखपूर्वक सुरतों में प्रयुक्त करनी चाहिए। देवर्षि नारद जी के इस वचन का श्रवण करके नरक भय से मोहित हो गया था। उसने आसार और प्रसार नगर में निवेदित कर दिया था। भौम (नरक) ने राक्षसों से सुरक्षित नगर को सभी ओर से राज्य को सुरक्षित कर दिया था। उस अवसर में भगवान् पश्चिम द्वार पर प्राप्त हुए थे। छःसहस्त्र पाशों के क्षुरों को अनेक प्रकार से भली भाँति छेदन करके उन्होंने गणों के साथ और बान्धवों सहित मुरु दैत्य का हनन कर दिया था। जो छः सहस्त्र महान् वीर दानव द्वार पर संस्थित थे। मुरु को मार कर दूसरे जो छःसहस्त्र उसके पुत्र थे उस समय उनको चक्र से मार गिराया था और अन्य दानवों को भी खण्ड-खण्ड कर दिया था। इसके उपरान्त वहाँ पर अनेक जो शिलाओं के संघ थे उन सबका अतिक्रमण करके भगवान् जनार्दन ने गणों के सहित और अनुचरों से संयुक्त निसुन्द को मार गिराया था। जिसने अकेले सहस्त्र वर्ष तक देवों से युद्ध किया था और महान् पराक्रम वाला वीर था उसने इन्द्र पर आक्रमण किया था।

ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ २३३ भगवान् केशव ने आक्रमण करके उस हयग्रीव का हनन किया था । महान् बलवान् भगवान् देवकी पुत्र ने मध्य में लौहित्य नामक की औदका में विरुपाक्ष और सुनन्द का हनन किया था । उसके अनन्तर फिर परमेश्वर ने वीर पञ्चजन को मारा था । इस महान् शरीरों वाले तथा महान् वीर्य वाले दुरासदों का वध करके फिर जगत् के नाथ प्राग्ज्योतिष पुर में गये थे । आकाश में स्थित देवों तथा महात्मा नारद के द्वारा जय-जयकार की ध्वनि से संस्तवन किये गए ईश्वर ने प्रवेश किया था । उन भगवान् विष्णु ने श्री समन्वित, देदीप्यमान, प्रकाश अट्टालिकाओं से विभूषित उस नगरी को ऐसा ही समझा था कि क्या यह इन्द्र की अमरावती है । वहाँ पर महान् युद्ध हुआ था । जो डरपोकों को भय देने वाला था और शूरों के हर्ष को बढ़ाने वाला था । जैसा कि देवासुर युद्ध हुआ था ठीक उसी प्रकार का यह युद्ध भी हुआ था । फिर गरुड़ पर विराजमान महान् बाहुबलों वाले जनार्दन प्रभु शांगं नामक धनुष से छोड़े गये बाणों के द्वारा उन बहुत से दानवों का हनन कर दिया था । महान् बाहुओं से समन्वित प्रभु आठ सौ सहस्त्रै असुरों को मार नर नरक के समीप में पहुँच गये थे । इसके अनन्तर उस नरक ने बहुत से असुरों को मृत सुनकर गरुड़ पर स्थित महा बलवान् महाबाहु भगवान् कृष्ण का दर्शन किया था । उसने वशिष्ठ मुनि के शाप तथा माधव के समय का स्मरण किया था । उसने देवर्षि नारदजी के वचन और विधाता के वर के छेदन का भी स्मरण किया । काल के प्राप्त हो जाने वाले ने श्रीभगवान् के साथ समागम किया था । उस समय वाण के वचन का स्मरण करते हुए उसने युद्ध करना ही परम कर्त्तव्य मान लिया था । वह सुवर्ण के रथ पर समारूढ़ हुआ था जो वज्र की ध्वजा वाला श्रेष्ठ था । वह रथ लोहे के आठ चक्रों ( पहियों ) से युक्त था । उस रथ में एक हजार अश्व थे ओर व्रज की ध्वजा से सुशोभित था । उस रथ में अनेक प्रकार शस्त्रास्त्र विद्यमान थे तथा बहुत तूणीर भी रखे थे । ऐसे रथ में बैठकर पृथ्वी का पुत्र नरक समर करने के लिए शीघ्र ही चला । वह जब युद्ध के

२३४ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ लिए जा रहा था तो उसने शीघ्र ही मानुषभाव को अर्चित किया था और हरि के पूर्व वचन का स्मरण करते हुए उसने असुरभाव की निन्दा की। क्षण भर में ही उसने भगवान् कृष्ण का गरुड़ पर विराजमान हुए का दर्शन प्राप्त किया था। भगवान् कृष्ण शंख, गदा, शार्ग, धनुष, वर और असि (खड्ग) को धारण किए हुए थे। वे अच्युत थे, किरीट और कुण्डलों को धारण करने वाले थे और उन के वक्षःस्थल में श्रीवत्स का चिह्न था। कौस्तुभ मणि से समुद्भास्ति वक्षःस्थल से युत, पीताम्बरधारी हरि का उसने दर्शन किया था। उन भगवान विष्णु के साथ उस वीर ने युद्ध किया था जिसके निकट युद्ध करते हुए कलिका के समान कालिका को देखा था जिसके लाल नेत्र और मुख था, विशालकाय थी, वह उस समय में खड्ग और शक्ति को धारण किए हुए थी। उसने धात्री और मोहिनी कामाख्या का भी वह वहाँ दर्शन किया था। उस समय में जगत् को प्रसूत करने वाली उस देवी का दर्शन करके वह भय से भीत होकर बहुत विस्मित हो गया था। युद्ध तो करना ही है अतएव उस समय में नरकासुर ने युद्ध किया था। उस अवसर पर भगवान् कृष्ण ने उसके साथ ऐसा अद्भुत युद्ध किया जैसा युद्ध पहले देवों में और मनुष्यों में कभी भी नहीं हुआ था। इसके अनन्तर उस भौम के साथ भगवान् माधव ने युद्ध क्रीड़ा चिरकाल करके देवेन्द्र को हर्षित करते हुए उसका हनन कर दिया। उस समय भगवान् हरि ने अपने सुदर्शन चक्र के द्वारा उसे दो भागों में छेद कर मार गिराया था। वह नरक खण्ड-खण्ड होकर भूमि पर गिर गया था। वह खण्ड ऐसे शोभित हो रहे थे जैसे वज्र से भिन्न पर हुआ गेरिक पर्वत होवे। तनय के गिर जाने पर देवी पृथिवी ने उसके पतित शरीर का अवलोकन करके शोक के वेग को सहन कर लिया क्योंकि उसने समागत काल का ज्ञान प्राप्त कर लिया था। काश्यपी अर्थात् पृथ्बी अदिति के दोनों कुण्डलों को लेकर स्वयं उपस्थित हुई थी और भगवान् गोविन्द से यह वचन कहा था—आपने वराह के रूप से पहले मेरा उद्धार किया था। उसी समय आपके गात्र के स्पर्श से यह नरक

൵ श्रीकालिका पुराण ൵ २३५ मेरा पुत्र गर्भ में स्थित हुआ था। वह आपसे ही उत्पन्न व प्रतिपालित हुआ और अब वह सुत आपने ही मार गिराया है। अब आप अदिति के इन दोनों कुण्डलों को ग्रहण कीजिए जो कि सब कामनाओं के प्रदान करने वाले हैं और अब आप उसकी सन्तति का हे गोविन्द! नित्य ही प्रतिपालन कीजिए। श्री भगवान् ने कहा-हे देवी! पहले भार के अवतरण करने के लिए आपने नरक के वध की प्रार्थना की थी। इसीलिए मैंने इसका वध किया हैं। हे देवि! आपके वचन से मैं इसकी सन्तान का प्रतिपालन करूँगा इसके नाती भगदत्त का मैं प्राग्ज्योतिष में अभिषेक कर दूँगा। इस तरह कहकर भगवान् ने अन्तःपुर में प्रवेश किया था जो कि नरक के धन का आलय था। वहाँ पर उन वीर ने अनेक प्रकार के रत्न देखे थे। वे सब शुद्ध रत्न समुदाय में एकत्रित हो रहे थे जैसे कोई पर्वत शोभायमान होवे। वहाँ पर मुक्तामणि और प्रवालों तथा वैदूर्यमणि का एक पर्वत-सा ही लग रहा था तथा रत्नकूट और वज्रकूट भी माधव प्रभु ने देखे थे। सुवर्ण के सञ्चित ढेरों को, रुक्मदण्डों को और परिपूर्ण ध्वजों, विचित्र वाहनों, यानों और शयनों को देखा था। ये सभी स्वर्ण और रत्नों से संचित थे, ये महान् मूल्य वाले और बहुत बड़े थे। जो- जो भी देखा और जितना धन, रत्न और मणियाँ थीं उस प्रकार की उतनी नरक आलय के अतिरिक्त अन्य स्थान में कहीं भी नहीं देखे गये थे। जितना धन और जितने रत्न नरक के आलय में थे वैसे और उतने कुबेर, इन्द्र, यम और वरुण के यहाँ पर भी नहीं थे। भगवान् केशव वहाँ पर ही देवर्षि नारद के साथ आये हुए थे। उस अन्तःपुर के धन का अवेक्षण करके जो सार तथा सारतर था पर वीरों के हनन करने वाले ने ग्रहण करने योग्य बहुत उनमें से ले लिया था। भगवान् विष्णु ने जो वैष्णवी शक्ति दी थी उसको भौम को हनन करके देवकीसुत ने वापस ग्रहण कर लिया। पृथिवी देवी और देवर्षि नारद के सहित उस अवसर पर भगवान् केशव ने भगदत्त भौम के सुत को प्राग्ज्योतिष पुर में अभिषिक्त करके उस पुर के मध्य में निवेशित कर दिया था। पृथिवी

२३६ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ ने उसी भगदत्त को अभिषिक्त देखकर अपनी मुक्ति के लिए भगवान् केशव से उसी भक्ति की याचना की थी। भगवान् केशव ने भी नारदजी की अनुमति प्राप्त करके क्षिति के कहने से सुप्रसन्न मन से उस भक्ति को भगदत्त के लिए दे दिया था। जिस छत्र को वरुण को पराजित करके भौम पहले ले आया था जो कि काञ्चनका नाम से संयुक्त था उस छत्र को भगवान् हरि ने लिया था। जो आठ भार सुवर्ण को प्रतिदिन स्रवित किया करता था, जो एक कोस तक विस्तीर्ण और आधे योजन तक ऊँचा था। केशव भगवान् ने समस्त उत्तम रत्नों, तथा चार दाँतों वाले गजों और चौदह हजार पूजित प्रमदाओं को दैत्यों के समुदायों के द्वारा द्वारका के प्रति भेज दिया था। पूर्व में जो देव कन्यायें नरक के द्वारा लायी गई थीं और बलपूर्वक उनका हरण किया गया था उनके लिए हृषीकेश भगवान् ने वेणीबन्ध विमोक्षण किया था। उनको अनेक वस्त्र और दिव्य-भूषणों से सत्कृत किया था उनको विमान में बिठाकर सुदृढ़ और बली रक्षकों से रक्षित करके वे सब मुनि से अधिष्ठित द्वारका की जो भेज दी गई थीं। जो सुर कन्याओं के लिए भूमिसुत ने मणियों का पर्वत बनाया था। वह पर्वत मणियों और रत्नों के समूह से परिपूर्ण था और सूर्य के ही समान प्रभा से समन्वित था। जगन्नाथ प्रभु ने उसको उखाड़ कर गरुड़ की पीठ पर स्थापित कर दिया था। सबको समारोपित करके सत्यभामा के साथ ही सुप्रसन्न हरि समासीन होकर जगत्पति भगदत्त और पृथ्वी से सम्भाषण करके आकाश के मार्ग से ही शीघ्र ही द्वारका की ओर प्रस्थान कर गये। गरुड़ काञ्चनस्रविछत्र को, मणिपर्वत को और सत्यभामा के सहित भगवान् केशव को लेकर आकाश में से गमन करता हुआ चला गया था। शत्रुओं के हनन करने वाले केशव भगवान् क्षणभर में द्वारका पहुँच कर सब बान्धवों और गणों के साथ परमानन्द को प्राप्त हुए थे। इसी रीति से महामाया जगन्मयी कालिका नाम वाली काली,

൵श्रीकालिका पुराण൵ २३७ जगतों के नाथ, भगवान् विष्णु को जो जगत के कारणों के करने वाले हैं, ज्ञान के द्वारा जानने के योग्य हैं और जगत् से परिपूर्ण हैं उसी भाँति सम्मोहित किया करती है जो अनुराग और विराग दोनों से ही समन्वित है। जो मित्र हैं उन पर अनुग्रह किया करते हैं और जो शत्रु हैं उनको हनन किया करते हैं। वे नारियों में गूढ़ होकर रमण किया करते हैं और द्वन्द्वों से भी मोहित होते हैं। हे विप्रो! यह आपके सामने मैंने कह दिया है जैसे नरक असुर हुआ था और जिस तरह से वरदानों का लाभ उसको हुआ था और जैसा भी कुछ उसका विचेष्टित अर्थात् कृत्य था।

| नारद आगमन वर्णन |

ऋषियों ने कहा कि गिरि की पुत्री काली कैसे जगतों को प्रसूत करने वाली हुई थी। दक्ष की पुत्री ने तनु का त्याग करके हर को फिर अपना पति किस प्रकार से प्राप्त कर लिया था ? उसने पति की प्रभुता का आधा शरीर कैसे हरण किया था-यह सब हम पूछने वाले हैं। हे महामते! आप भली भाँति यह सब वर्णन कीजिए। मार्कण्डेय महर्षि ने कहा-हे मुनि शार्दूल तो आप लोग श्रवण कीजिए कि जिस तरह से दाक्षायणी सती हुई और फिर गिरि की पुत्री ने जैसे पूर्व में आधा शरीर किया था। पूर्व में दाक्षायणी सती ने शरीर का त्याग किया था। उसी समय में हिमवान् गिरि को मेनका मन से उत्पन्न हो गई थी। जिस समय हिमाचल पर दक्षकन्या हर के साथ खेलती थीं उस समय में मेनका उसी हितैषिणी हुई। हे द्विजो! मैं उसकी सुता होऊँ, यह मन में धारण करके उसी समय देवी ने प्राण त्याग दिये और वह हिमवान् की पुत्री हुई। जिस समय पहले दक्ष के ऊपर क्रोध करके दाक्षायणी ने प्राणों का त्याग किया था, उसी समय मेनका देवी शिवा की आराधना करने की इच्छा वाली हुई थी। उसने महामाया, जगत् की धात्री, सनातनी, योगनिद्रा, मोहिनी जो सब प्राणियों को मोहन करने वाली है और सब स्वर्गवासियों की

२३८ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ रक्षिका है उसी शिवा का आराधना किया था। उसने अष्टमी में उपवास करके नवमी तिथि में मोदकों, बलियों, पिष्टों और पायसों तथा गन्ध और पुष्पों से चैत्र मास से आरम्भ करके सत्ताईस वर्ष तक प्रतिदिन शुचि होकर पुत्र की इच्छा से भली भाँति पूजा की थी। गंगा में औषधियों के प्रस्थ में मृत्तिका से परिपूर्ण मूर्ति का निर्माण करके पूजा करती थी। किसी समय तो बिना ही आहार के रह जाती थी और किसी समय व्रत धारण करने वाली होती थी। शिवा में अपने मन को विन्यस्त कर देने वाली उस मेनका देवी ने जो परम भक्ति की इच्छा रखने वाली थी, सत्ताईस वर्ष व्यतीत किए थे। सत्ताईस वर्षों के अन्त में जगत् की माता जगन्मयी परम प्रसन्न हो गई थी और प्रत्यक्ष में प्राप्त होकर बोली। देवी ने कहा-हे देवी! आपने जो प्रार्थना की थी वह अब मुझसे याचना करो। मैं तुमको सभी कुछ दे दूँगी जो भी तुम्हारे हृदय में वांछित मनोरथ होवे। इसके अनन्तर मेनका देवी ने प्रत्यक्ष में समागत हुई कालिका का दर्शन करके उसने देवी को प्रणाम किया था। इसके अनन्तर वह बोली। देवी, मैंने इस समय आपके प्रत्यक्ष स्वरूप का दर्शन प्राप्त किया है। हे शिवे! यदि आप मुझ पर सुप्रसन्न हैं तो मैं आपकी स्तुति करना चाहती हूँ। इसके अनन्तर सबको मोहित करने वाली कालिका 'माता'-यह कहकर फैली हुई बाहुओं से मेनका का उसने आलिंगन किया था। इसके उपरान्त उन मेनका देवी ने अभीष्ट वाणियों के द्वारा प्रत्यक्ष रूप में विराजमान शिवा का स्तवन किया था। मेनका ने कहा-जगत् के धामों को प्रेरणा करने वाली, लोकों को धारण करने वाली चण्डका जगत् की धात्री और सब कामों और अर्थ को धारण करने वाली को मैं प्रणाम करती हूँ। नित्य आनन्द वाली, ज्ञान से परिपूर्ण योगनिद्रा, जगत् को प्रसूत करने वाली, शूद्रा, शिवा, विधाता, शौरि और शिव के स्वरूप वाली को मैं प्रणाम करती हूँ। मायामती, महामाया, भक्तों के शोक का विनाश करने वाली, काम की वनिता, चिति, शिवा आपको मैं नमस्कार करती हूँ।

൵०२ श्रीकालिका पुराण ൵०२ २३९ सत्त्व के उद्रेक से मिथ्या जो यहाँ पर होने वाली है और जो नित्य प्राणियों की बुद्धि के स्वरूप वाली है वही आप यतियों के बन्धन को छेदन करने हेतु हैं। ऐसा कौन है जो मुझ जैसे द्वारा आपका प्रभाव कहने के योग्य होवे। अर्थात् प्रभाव को कोई भी मुझ सरीखा नहीं कह सकता । जो आप सामों की सिद्धि की शक्ति हैं तथा जो आप अथर्ववेद की हिस्सा हैं वह आप नित्यकामा हैं और मेरे इष्ट को करें। नित्या नित्य, भागहीन, पुरस्थ जिन तन्मात्राओं से भूतों का स्वर्ग पतित होता है उनकी सदा नित्यरूपा शक्ति आप ही हैं। कौन सी स्त्री है जो आपके योग्य कथन करने से समर्थ हो । आप जगत् को धारण करने वाली हैं जिनके द्वारा ब्रह्मा वश में किया जाता है वह आप नित्या मुझ पर, हे माता! प्रसन्न होवें। आप जगत वेद में रहने वाले शक्ति के स्वरूप वाली हैं, सूर्य के किरणों की दाह करने वाली शक्ति आप ही हैं, आप चन्द्रिका की आह्लाद करने वाली शक्ति हैं आपका मैं स्तवन करती हूँ और अम्बिका को प्रणाम करती हूँ। योषित् के प्रेमियों की आप योषा हैं, आप ऊर्ध्वरेताओं की विद्या हैं, आप समस्त जगतों की वाञ्छा हैं और आप ही भगवान् हरि की माया हैं। जो नित्य ही अनेक स्वरूपों को धारण कर के सृष्टि और प्रलय करने वाली हैं। आप ही ब्रह्मा, अच्युत और शिव के शरीरों के हेतु हैं। आप मुझ पर प्रसन्न हो जाइए। मैं आपको पुनः प्रणाम करती हूँ। इसके अनन्तर वह जगतों की माता कालिका पुनः मेनका देवी से बोली थी कि जो भी आपका अभीष्ट वर हो उसका वरण कर लो। इसके अनन्तर यशस्विनी मेनका ने सबसे प्रथम तो सौ पुत्रों के उत्पन्न होने का वरदान माँगा था जो पुत्र वीर्य, पराक्रम और आयु से संयुक्त होवें और ऋषि-सिद्धि से भी युक्त होंगे। इसके अनन्तर एक कन्या के उत्पन्न होने का वरदान चाहा था जो सुन्दर रूप वाली गुण गणों से शोभायमान, दोनों कुलों का आनन्द करने वाली और तीनों भुवनों में दुर्लभ होवे। इसके पश्चात् मुनियों के समान मेनका से भगवती ने कहा था जो मन्द मुस्कान पूर्वक उसके मनोरथ को पूर्ण करती हुई थीं। देवी

२४० ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ ने कहा-आपके एक सौ पुत्र होंगे जो बल वीर्य से समन्वित होंगे। उनमें मुख्य एक बलवान् सबसे प्रथम होगा। और आपकी पुत्री देवों, मनुष्यों और राक्षसों के हित के लिए तथा सम्पूर्ण जगतों की भलाई के लिए मैं होऊँगी। आप सुखपूर्वक प्रसव करने वाली तथा नित्य ही पतिव्रता, अम्लान रूप से सम्पन्न और सुभगा होंगी। इस रीति से इतना कहकर जगत् की धात्री वहीं पर अन्तर्धान हो गई थी। मेनका परम प्रसन्नता की प्राप्ति करके अपने स्थान में प्रवेश कर गई थी। इसके उपरान्त काल के सम्प्राप्त होने पर मेनका ने अचलों में अत्युत्तम मैनाक पर्वत को प्रसूत किया था। जो आज तक पंखों के सहित सागर के मध्य निवास किया करता है। ये सभी पुत्र महान् वीर्य वाले महान् सत्त्व से समन्वित और सभी गणों से सुसम्पन्न थे। इसके उपरान्त वह जगन्मयी योगनिद्रा कालिका देवी जिसने पूर्व में सती के रूप का त्याग कर दिया था जन्म ग्रहण करने के लिए मेनका के समीप में गयी थीं। भय के अनुसार मेनका के उदर से शिवा ने समुद्भूत होकर सागर से लक्ष्मी की ही भाँति समुत्पत्ति ग्रहण की थी। बसन्त के समझ नक्षत्र के योग से नवमी तिथि में देवी आधी रात्रि में राशि के मण्डल से गंगा के ही समान समुत्पन्न हुई। उसके समुत्पन्न होने पर सभी दिशाएं प्रसन्न हो गयीं थी। उस अवसर पर परम शुभ सुगन्धित और गम्भीर वायु बहने लगी। उस समय पुष्पों की वर्षा हुई थी और जल की वृष्टि भी हुई। जो अग्नियां शान्त थीं वे प्रज्वलित हो गई थीं और घन गम्भीर गर्जन करने लगे थे। उस देवी के समुत्पन्न होने मात्र से सबने स्वास्थ्य की प्राप्ति की थी। नील कमलों के दलों के समान समुत्पन्न हो श्यामा थी, देवी मेनका अतीव हर्षित होकर परम आनन्द को प्राप्त हुई थी और देवों ने भी उस समय बारम्बार अतुल हर्ष की प्राप्ति की। गन्धर्व और अप्सराओं के समुदाय आकाश में स्थिर होकर स्तवन कर रहे थे। हिमवान् की सुता को 'काली' नाम से बुलाया था तथा काली नाम से गिरिनन्दनी कीर्त्तिका की गई थी। इसके उपरान्त वह वर्षा के समय गंगा तथा शरत्काल में चाँदनी के समान बड़ी होने लगी।

ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ २४१ प्रतिदिन वृद्धि को प्राप्त हुई वह सुन्दरी चन्द्रबिम्ब की कला ही की भाँति शोभा धारण करने लगी अर्थात् वह दिनों दिन विशेष सुन्दरी होती चली गयी थी । वह बालिका भाव को प्राप्त हुई क्रीड़ा करती सखियों के साथ परम प्रसन्नता को प्राप्त होती थी। जिस प्रकार से सरिताओं के समुदायों से कालिन्दी विपुलता को प्राप्त किया करती हैं। षड्गुणों ने स्वयं ही उस देवी के पूर्व जन्म के वशीकृतता को प्राप्त कर लिया था। हे द्विज श्रेष्ठों! वे षड्गुण वर्षा को कालिका के ही समान स्वयं ही उसके समीप आ कर उपस्थित हो गये थे। उस देवी ने अपने गुणों से देवी की कन्याओं का भी अतिक्रमण कर दिया था अर्थात् देव कन्याओं से भी अधिक गुणों वाली हो गई थी। अपने रूप लावण्य से अब अप्सराओं से भी अधिक थी। वह बाल्यकाल में ही निरन्तर बन्धु वर्ग की प्रिय और शुभ थी। उसने सद्गुणों के द्वारा अपने बन्धुओं के द्वारा अपने बन्धुओं को माता और पिता कर दिया था। वह जगन्माता नित्य ही अपनी माता का स्तवन करने वाली थी और अपने पिता के यजन करने में तत्पर रहा करती थी। वह सर्वदा अपने भाइयों के साथ रहने वाली, वह सम्पूर्ण जगती की माता सर्वदा कन्या के स्वरूप में समुपस्थित हुई थी। जिस तरह से विभावसु के समीप में कालिन्दी निवास किया करती है उसी भाँति वह भी सदा अपने पिता के समीप निवास किया करती है। इसके अनन्तर एक बार हिमवान् गिरि उसे अपने पास रखकर अपने पुत्रों के साथ संगत होकर परम कौतुक से स्थित हुए थे। इसके उपरान्त देवलोक से नारद मुनि वहाँ पधारे। उन्होंने हिमवान् को सुतों के साथ सुखपूर्वक आसीन देखा था। उनके निकट उन्होंने सूर्य से कालिका के समान ही काली का भी अवलोकन किया था जैसे चन्द्रमा की चाँदनी हो जो कि शरत्काल की रात्रि में भली भाँति बढ़ी हुई हुआ करती है। उस गिरिराज के द्वारा उन नारद मुनि का अभ्यर्चन किया गया था और उनको आसन आसीन होने के लिए दिया गया। उस आसन पर बैठे हुए देवर्षि नारदजी ने सबसे प्रथम उस पर्वतराज से

२४२ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ कुशल प्रश्न और वृत्तान्त पूछा। बोलने में महान् कुशल देवर्षि नारदजी ने जब सम्पूर्ण वृत्तान्त जान लिया तो बहुत ही हर्षित हो मेनका से बोले-यह आपकी पुत्री बहुत सुन्दर है और चन्द्रमा की आद्यकाल के ही समान वर्धित हो गई है। हे शैलराज! यह आपकी कन्या समस्त सुलक्षणों से शोभायमान है। यह सदा हर के अनुकूल भगवान् शम्भु की दयिता होने वाली है। यह तपस्विनी चित्त को अपने वश में कर लेगी और वे भगवान् शम्भु भी इसके अतिरिक्त अन्य किसी स्त्री के साथ विवाह नहीं करेंगे। इन दोनों का जैसा प्रेम है वैसा दूसरे किसी का नहीं होगा। इसके द्वारा बहुत से सुरों के कार्य होंगे। हे गिरियों में श्रेष्ठ! इसी के द्वारा भगवान् हर अर्ध नारीश्वर हैं। और इसी को चन्द्रमा की ज्योत्स्ना के ही तुल्य परम सौहार्द होगा। वह भगवान् शिव के आधे शरीर को अपने आस्पद में करेगी। तप के द्वारा भगवान् हरि के प्रसन्न होने पर यह विद्युत के समान तुम्हारी पुत्री काली हो जायेगी। इसके पीछे यह गौरी इस नाम से लोक में ख्याति को प्राप्त करेगी। शिव के अतिरिक्त अन्य किसी के भी लिये इसके प्रदान करने को आप अपना मन करने योग्य नहीं है। देवर्षि नारदजी के वचन का श्रवण कर विशारद हिमवान् ने मुनि से कहा-वे महादेवजी सङ्ग को त्याग किये हुए हैं और संयत आत्मा वाले हैं। वे तो देवों के अगोचर उपांशु तप का समाचरण कर रहे हैं। हे देवर्षि! वे ध्यान के मार्ग में समाधिस्त है और अपना मन परब्रह्म में अर्पित कर रखा है। वे उससे किस प्रकार भ्रष्ट होंगे। इसमें मुझे बड़ा भारी संशय हो रहा है। वह परब्रह्म अक्षर हैं और प्रदीप की कालिका के ही समान हैं। वे सर्वत्र अन्दर ही देखा करते हैं और बाहर के पदार्थों को कभी भी नहीं देखते हैं। हे द्विज! यह बात नित्य ही किन्नरों के मुख से सुनी जाती थी। जिनका अन्तःकरण इस प्रकार का है वे हर कैसे ध्यान भ्रष्ट किए जा सकते हैं। विशेष रूप से यह सुना गया है कि भगवान् शम्भु ने दाक्षायणी के साथ पूर्व में प्रणयन किया था। उसे मैं कहता हूँ मुझसे आप श्रवण कीजिए। शिव ने दाक्षायणी से कहा था।

ൠൡ श्रीकालिका पुराण ൠൡ २४३ ︽❖︾︽❖︾︽❖︾︽❖︾︽❖︾︽❖︾︽❖︾︽❖︾︽❖︾︽❖︾︽❖︾︽❖︾ हे प्रिये! हे सति! तुम्हारे बिना मैं अन्य किसी भी वनिता को अपनी भार्या बनाने के लिए ग्रहण नहीं करूँगा। यह सर्वथा सत्य है जिससे मैं आपको बता रहा हूँ। अब उस सती के मृत को जाने पर वे कैसे अन्य स्त्री का ग्रहण करेंगे। देवर्षि नारदजी ने कहा हे गिरिराज! इस विषय में आपको चिन्ता नहीं करनी चाहिए। आपकी पुत्री सती ही उत्पन्न हुई है और यह हर के लिए ही जन्म धारण करने वाली हुई है। इसमें लेशमात्र भी संशय नहीं है। इतना कहकर ही देवर्षि नारदजी ने गिरिराज से यह सभी कहकर सुना दिया था जिस तरह से सती मेनका के उदर से समुत्पन्न हुई थी। गिरिराज ने वह सब पूर्व में घटित वृत्तान्त नारदजी के मुख से श्रवण किया तो वह अपने पुत्रों और द्वारा के सहित संशयहीन हो गये। उस अवसर पर काली ने नारद जी के मुख से यह कथा का श्रवण किया था और वह लज्जा से नीचे की ओर मुख वाली हो गई थी और मन्द मुस्कान में विस्तृत सुख वाली हो गई थी। गिरि हिमवान् ने उस सती को हाथ से पकड़कर और मुख को ऊपर की ओर उठाकर उसके मस्तक पर आघ्राण करके उसको अपने ही आसन पर बिठा लिया था। इसके अनन्तर नारदजी ने पुनः शैलराज की पुत्री से कहा था। जिससे गिरिराज और तनयों के सहित मेनका को बड़ा हर्ष हो रहा था। हे शैलराज! आपके इस सिंहासन से इनको क्या होगा। इसका आसन तो सदा ही भगवान् शम्भु के ऊरु होगा। अर्थात् आपके द्वारा दिया हुआ सिंहासन का आसन इसके लिए कोई महत्व की बात नहीं है क्योंकि यह तो शम्भु के ऊरुओं पर बैठने वाली होगी। हे गिरि! हर के ऊरुओं का आसन प्राप्त करके इसे अन्य किसी भी आसन पर तुष्टि की प्राप्ति नहीं हो सकती हैं। देवर्षि नारदजी ने परम आदर वचन शैलराज से कहा था और देवयानों के द्वारा वे उसी क्षण स्वर्ग चले गये। गिरिपति भी चिन्ता, हर्ष और सम्मोह से संयुत होकर अपनी अचला भार्या के सहित पद्म गर्भ अन्तःपुर में प्रवेश कर गये।

२४४ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ भगवान शिव का हिमवान में निवास वहीं पर परम से पर अक्षर अपने आत्मा को तथा नित्य ही ज्ञानमय चित्त एवं निरामय और निराकुल ज्योतिरूप, प्रदीप की आभा वाले, जगन्मय, द्वैत से हीन, विशेष रूप से एकाग्र होकर भर्ग भगवान् शिव चिन्तन करने लगे। कुछ दूसरे नन्दी, भृङ्गी आदि जो गण थे वे महाभाग द्वारों पर स्थित थे किन्तु ध्वनि नहीं होती थी। वे सभी शब्दहीन होते हुए संस्थित थे अन्य गण वहाँ से सुदूर अन्तर पर स्थिर होकर क्रीड़ा कर रहे थे। कुसुमों, दलों, भक्तों और गिरि के झरनों से रत्नों को खोजते हुए गैनिकों से भूषित वे गण थे। गिरिराज गणों के सहित गए हुए भगवान् हर का विलोकन करके गणों के सहित अपने स्थान औषधिप्रस्थ से निर्गत होकर पूजा के लिए उपस्थित हुए थे और यथोचित रूप से उनका अभ्यर्चन किया था। भगवान् शम्भु ने भी पराश्रद्धा से संयुक्त होकर उसकी अर्चना ग्रहण की थी। ध्यान योग में स्थित मुस्कराते हुए से उस गिरिराज से ईश्वर ने कहा-मैं आपके इस प्रस्थ पर तप का समाचरण करने के लिए ही इस एकान्त स्थल में समागत हूँ। मेरे समीप में कोई भी न आये ऐसी व्यवस्था कर दीजिए। आप महान् आत्मा वाले हैं आप जगत् के धाम है और मुनियों के सदाश्रय हैं। देवों, राक्षसों, यक्षों और किन्नरों तथा द्विजातियों के सद् आवास, हे गिरिश्रेष्ठ! मैंने वहाँ पर आश्रय ग्रहण किया है सो अब जो योग्य हो वह सब करिये। इतना कहकर जगतों के स्वामी वृषभध्वज चुप हो गये थे। उसी समय गिरिराज ने भगवान शम्भु से प्रणय पूर्वक यह कहा था। हे परमेश्वर! आप तो जगतों के स्वामी हैं। आपने मुझे पवित्र कर दिया है कि आपने इस मेरे देश में समागम किया है। इससे आगे जो भी मेरा कर्त्तव्य हो वह मुझे उपदेश कीजिए। आप तो महान् तप के द्वारा यत्नों में परायण देवों के द्वारा भी प्राप्त नहीं हुआ करते हैं। हे जगन्नाथ! मेरा बड़ा सौभाग्य है कि आप स्वयं ही यहाँ पर पदार्पण कर उपस्थित हो गये हैं। मैं तो यही समझता हूँ कि मुझसे अधिक धन्य कोई भी नहीं हैं। और न मुझसे अधिक कोई पुण्यशाली

श्रीकालिका पुराण २४५ ही है। जो कि आप तपश्चर्या करने के लिए हिमवान् के प्रस्थ पर स्वयं ही समुपस्थित हो गये हैं। हे परमेश्वर! मैं तो अपने आपको देवेन्द्र से भी अधिक मानता हूँ कि गणों के सहित आपके द्वारा स्वेच्छा से जिस समय में मैं प्राप्त हो गया हूँ। इतना कहकर गिरिराज पुनः अपने घर में आ गये थे। और उसने नियम के लिए अपने परिवारों को तथा गणों को आदेश दिया था। आज से कोई भी गंगावतरण पर नहीं जायेगा। मेरे शासन के बिना जो कोई भी वहाँ पर गमन करेगा उसको मैं दण्डित करूँगा। उस गिरिराज हिमवान् ने इस रीति से अपने लोगों को नियमित करके तिल, पुष्प, कुशा और फल लेकर शीघ्र ही अपनी ही पुत्री के साथ भगवान् शम्भु के समीप गमन किया था। इसके अनन्तर ध्यान में परायण जगन्नाथ शम्भु के समीप में गमन करके सब गणों से समन्विता काली अपनी पुत्री से प्रणाम करवाया। जो तिल पुष्प आदि थे वह सभी उससे उनके आगे रख दिया था। फिर अपनी पुत्री को आगे करके उस शैलों के राजा ने भगवान् शम्भु से यह कहा—हे भगवान्! मेरी पुत्री आपकी आराधना करने के लिए समादिष्ट है और आपकी आराधना की इच्छा से यहाँ पर लाई गई है। यदि आपका मेरे ऊपर अनुग्रह है तो आप इसको सेवा करने के लिए अनुज्ञा प्रदान कीजिए। इसके अनन्तर भगवान् शंकर ने उसका अवलोकन किया था कि वह प्रथम यौवन में आरूढ़ थी और उसके विकसित कमलों के सदृश एवं उसका मुख पूर्णचन्द्र के समान था। वह समग्र केशों के समूह से वेश विजृम्भिका को प्राप्त हुई थी। उसकी ग्रीवा कम्बु के समान थी। उसके नेत्र विशाल थे और उसके दोनों कानों का जोड़ा परम सुन्दर एवं उज्जवल था। मृणाल के सदृश आयत पर्यन्त बाहुओं के युग्म से वह परम मनोहर थीं। उसके कुण्डलों के स्थान में कमल थे और पीन एवं उन्नत स्तनों से शोभित थी। सुन्दर और क्षीण मध्यभाग के धारण करने वाले थी और उसके दोनों पादों से वह परम मनोरम थी। मध्य भाग से क्षीण, महान् सत्त्व वाली स्थूल