कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)
पृष्ठ 232, कुल 442 में से
संदर्भ में पढ़ें२३४ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ लिए जा रहा था तो उसने शीघ्र ही मानुषभाव को अर्चित किया था और हरि के पूर्व वचन का स्मरण करते हुए उसने असुरभाव की निन्दा की। क्षण भर में ही उसने भगवान् कृष्ण का गरुड़ पर विराजमान हुए का दर्शन प्राप्त किया था। भगवान् कृष्ण शंख, गदा, शार्ग, धनुष, वर और असि (खड्ग) को धारण किए हुए थे। वे अच्युत थे, किरीट और कुण्डलों को धारण करने वाले थे और उन के वक्षःस्थल में श्रीवत्स का चिह्न था। कौस्तुभ मणि से समुद्भास्ति वक्षःस्थल से युत, पीताम्बरधारी हरि का उसने दर्शन किया था। उन भगवान विष्णु के साथ उस वीर ने युद्ध किया था जिसके निकट युद्ध करते हुए कलिका के समान कालिका को देखा था जिसके लाल नेत्र और मुख था, विशालकाय थी, वह उस समय में खड्ग और शक्ति को धारण किए हुए थी। उसने धात्री और मोहिनी कामाख्या का भी वह वहाँ दर्शन किया था। उस समय में जगत् को प्रसूत करने वाली उस देवी का दर्शन करके वह भय से भीत होकर बहुत विस्मित हो गया था। युद्ध तो करना ही है अतएव उस समय में नरकासुर ने युद्ध किया था। उस अवसर पर भगवान् कृष्ण ने उसके साथ ऐसा अद्भुत युद्ध किया जैसा युद्ध पहले देवों में और मनुष्यों में कभी भी नहीं हुआ था। इसके अनन्तर उस भौम के साथ भगवान् माधव ने युद्ध क्रीड़ा चिरकाल करके देवेन्द्र को हर्षित करते हुए उसका हनन कर दिया। उस समय भगवान् हरि ने अपने सुदर्शन चक्र के द्वारा उसे दो भागों में छेद कर मार गिराया था। वह नरक खण्ड-खण्ड होकर भूमि पर गिर गया था। वह खण्ड ऐसे शोभित हो रहे थे जैसे वज्र से भिन्न पर हुआ गेरिक पर्वत होवे। तनय के गिर जाने पर देवी पृथिवी ने उसके पतित शरीर का अवलोकन करके शोक के वेग को सहन कर लिया क्योंकि उसने समागत काल का ज्ञान प्राप्त कर लिया था। काश्यपी अर्थात् पृथ्बी अदिति के दोनों कुण्डलों को लेकर स्वयं उपस्थित हुई थी और भगवान् गोविन्द से यह वचन कहा था—आपने वराह के रूप से पहले मेरा उद्धार किया था। उसी समय आपके गात्र के स्पर्श से यह नरक