कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें൵ श्रीकालिका पुराण ൵ २३५ मेरा पुत्र गर्भ में स्थित हुआ था। वह आपसे ही उत्पन्न व प्रतिपालित हुआ और अब वह सुत आपने ही मार गिराया है। अब आप अदिति के इन दोनों कुण्डलों को ग्रहण कीजिए जो कि सब कामनाओं के प्रदान करने वाले हैं और अब आप उसकी सन्तति का हे गोविन्द! नित्य ही प्रतिपालन कीजिए। श्री भगवान् ने कहा-हे देवी! पहले भार के अवतरण करने के लिए आपने नरक के वध की प्रार्थना की थी। इसीलिए मैंने इसका वध किया हैं। हे देवि! आपके वचन से मैं इसकी सन्तान का प्रतिपालन करूँगा इसके नाती भगदत्त का मैं प्राग्ज्योतिष में अभिषेक कर दूँगा। इस तरह कहकर भगवान् ने अन्तःपुर में प्रवेश किया था जो कि नरक के धन का आलय था। वहाँ पर उन वीर ने अनेक प्रकार के रत्न देखे थे। वे सब शुद्ध रत्न समुदाय में एकत्रित हो रहे थे जैसे कोई पर्वत शोभायमान होवे। वहाँ पर मुक्तामणि और प्रवालों तथा वैदूर्यमणि का एक पर्वत-सा ही लग रहा था तथा रत्नकूट और वज्रकूट भी माधव प्रभु ने देखे थे। सुवर्ण के सञ्चित ढेरों को, रुक्मदण्डों को और परिपूर्ण ध्वजों, विचित्र वाहनों, यानों और शयनों को देखा था। ये सभी स्वर्ण और रत्नों से संचित थे, ये महान् मूल्य वाले और बहुत बड़े थे। जो- जो भी देखा और जितना धन, रत्न और मणियाँ थीं उस प्रकार की उतनी नरक आलय के अतिरिक्त अन्य स्थान में कहीं भी नहीं देखे गये थे। जितना धन और जितने रत्न नरक के आलय में थे वैसे और उतने कुबेर, इन्द्र, यम और वरुण के यहाँ पर भी नहीं थे। भगवान् केशव वहाँ पर ही देवर्षि नारद के साथ आये हुए थे। उस अन्तःपुर के धन का अवेक्षण करके जो सार तथा सारतर था पर वीरों के हनन करने वाले ने ग्रहण करने योग्य बहुत उनमें से ले लिया था। भगवान् विष्णु ने जो वैष्णवी शक्ति दी थी उसको भौम को हनन करके देवकीसुत ने वापस ग्रहण कर लिया। पृथिवी देवी और देवर्षि नारद के सहित उस अवसर पर भगवान् केशव ने भगदत्त भौम के सुत को प्राग्ज्योतिष पुर में अभिषिक्त करके उस पुर के मध्य में निवेशित कर दिया था। पृथिवी