कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२३६ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ ने उसी भगदत्त को अभिषिक्त देखकर अपनी मुक्ति के लिए भगवान् केशव से उसी भक्ति की याचना की थी। भगवान् केशव ने भी नारदजी की अनुमति प्राप्त करके क्षिति के कहने से सुप्रसन्न मन से उस भक्ति को भगदत्त के लिए दे दिया था। जिस छत्र को वरुण को पराजित करके भौम पहले ले आया था जो कि काञ्चनका नाम से संयुक्त था उस छत्र को भगवान् हरि ने लिया था। जो आठ भार सुवर्ण को प्रतिदिन स्रवित किया करता था, जो एक कोस तक विस्तीर्ण और आधे योजन तक ऊँचा था। केशव भगवान् ने समस्त उत्तम रत्नों, तथा चार दाँतों वाले गजों और चौदह हजार पूजित प्रमदाओं को दैत्यों के समुदायों के द्वारा द्वारका के प्रति भेज दिया था। पूर्व में जो देव कन्यायें नरक के द्वारा लायी गई थीं और बलपूर्वक उनका हरण किया गया था उनके लिए हृषीकेश भगवान् ने वेणीबन्ध विमोक्षण किया था। उनको अनेक वस्त्र और दिव्य-भूषणों से सत्कृत किया था उनको विमान में बिठाकर सुदृढ़ और बली रक्षकों से रक्षित करके वे सब मुनि से अधिष्ठित द्वारका की जो भेज दी गई थीं। जो सुर कन्याओं के लिए भूमिसुत ने मणियों का पर्वत बनाया था। वह पर्वत मणियों और रत्नों के समूह से परिपूर्ण था और सूर्य के ही समान प्रभा से समन्वित था। जगन्नाथ प्रभु ने उसको उखाड़ कर गरुड़ की पीठ पर स्थापित कर दिया था। सबको समारोपित करके सत्यभामा के साथ ही सुप्रसन्न हरि समासीन होकर जगत्पति भगदत्त और पृथ्वी से सम्भाषण करके आकाश के मार्ग से ही शीघ्र ही द्वारका की ओर प्रस्थान कर गये। गरुड़ काञ्चनस्रविछत्र को, मणिपर्वत को और सत्यभामा के सहित भगवान् केशव को लेकर आकाश में से गमन करता हुआ चला गया था। शत्रुओं के हनन करने वाले केशव भगवान् क्षणभर में द्वारका पहुँच कर सब बान्धवों और गणों के साथ परमानन्द को प्राप्त हुए थे। इसी रीति से महामाया जगन्मयी कालिका नाम वाली काली,