भारतकोश
कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 235, कुल 442 में से

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पृष्ठ 235

൵श्रीकालिका पुराण൵ २३७ जगतों के नाथ, भगवान् विष्णु को जो जगत के कारणों के करने वाले हैं, ज्ञान के द्वारा जानने के योग्य हैं और जगत् से परिपूर्ण हैं उसी भाँति सम्मोहित किया करती है जो अनुराग और विराग दोनों से ही समन्वित है। जो मित्र हैं उन पर अनुग्रह किया करते हैं और जो शत्रु हैं उनको हनन किया करते हैं। वे नारियों में गूढ़ होकर रमण किया करते हैं और द्वन्द्वों से भी मोहित होते हैं। हे विप्रो! यह आपके सामने मैंने कह दिया है जैसे नरक असुर हुआ था और जिस तरह से वरदानों का लाभ उसको हुआ था और जैसा भी कुछ उसका विचेष्टित अर्थात् कृत्य था।

| नारद आगमन वर्णन |

ऋषियों ने कहा कि गिरि की पुत्री काली कैसे जगतों को प्रसूत करने वाली हुई थी। दक्ष की पुत्री ने तनु का त्याग करके हर को फिर अपना पति किस प्रकार से प्राप्त कर लिया था ? उसने पति की प्रभुता का आधा शरीर कैसे हरण किया था-यह सब हम पूछने वाले हैं। हे महामते! आप भली भाँति यह सब वर्णन कीजिए। मार्कण्डेय महर्षि ने कहा-हे मुनि शार्दूल तो आप लोग श्रवण कीजिए कि जिस तरह से दाक्षायणी सती हुई और फिर गिरि की पुत्री ने जैसे पूर्व में आधा शरीर किया था। पूर्व में दाक्षायणी सती ने शरीर का त्याग किया था। उसी समय में हिमवान् गिरि को मेनका मन से उत्पन्न हो गई थी। जिस समय हिमाचल पर दक्षकन्या हर के साथ खेलती थीं उस समय में मेनका उसी हितैषिणी हुई। हे द्विजो! मैं उसकी सुता होऊँ, यह मन में धारण करके उसी समय देवी ने प्राण त्याग दिये और वह हिमवान् की पुत्री हुई। जिस समय पहले दक्ष के ऊपर क्रोध करके दाक्षायणी ने प्राणों का त्याग किया था, उसी समय मेनका देवी शिवा की आराधना करने की इच्छा वाली हुई थी। उसने महामाया, जगत् की धात्री, सनातनी, योगनिद्रा, मोहिनी जो सब प्राणियों को मोहन करने वाली है और सब स्वर्गवासियों की