कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंॐ श्रीकालिका पुराण ॐ २३३ भगवान् केशव ने आक्रमण करके उस हयग्रीव का हनन किया था । महान् बलवान् भगवान् देवकी पुत्र ने मध्य में लौहित्य नामक की औदका में विरुपाक्ष और सुनन्द का हनन किया था । उसके अनन्तर फिर परमेश्वर ने वीर पञ्चजन को मारा था । इस महान् शरीरों वाले तथा महान् वीर्य वाले दुरासदों का वध करके फिर जगत् के नाथ प्राग्ज्योतिष पुर में गये थे । आकाश में स्थित देवों तथा महात्मा नारद के द्वारा जय-जयकार की ध्वनि से संस्तवन किये गए ईश्वर ने प्रवेश किया था । उन भगवान् विष्णु ने श्री समन्वित, देदीप्यमान, प्रकाश अट्टालिकाओं से विभूषित उस नगरी को ऐसा ही समझा था कि क्या यह इन्द्र की अमरावती है । वहाँ पर महान् युद्ध हुआ था । जो डरपोकों को भय देने वाला था और शूरों के हर्ष को बढ़ाने वाला था । जैसा कि देवासुर युद्ध हुआ था ठीक उसी प्रकार का यह युद्ध भी हुआ था । फिर गरुड़ पर विराजमान महान् बाहुबलों वाले जनार्दन प्रभु शांगं नामक धनुष से छोड़े गये बाणों के द्वारा उन बहुत से दानवों का हनन कर दिया था । महान् बाहुओं से समन्वित प्रभु आठ सौ सहस्त्रै असुरों को मार नर नरक के समीप में पहुँच गये थे । इसके अनन्तर उस नरक ने बहुत से असुरों को मृत सुनकर गरुड़ पर स्थित महा बलवान् महाबाहु भगवान् कृष्ण का दर्शन किया था । उसने वशिष्ठ मुनि के शाप तथा माधव के समय का स्मरण किया था । उसने देवर्षि नारदजी के वचन और विधाता के वर के छेदन का भी स्मरण किया । काल के प्राप्त हो जाने वाले ने श्रीभगवान् के साथ समागम किया था । उस समय वाण के वचन का स्मरण करते हुए उसने युद्ध करना ही परम कर्त्तव्य मान लिया था । वह सुवर्ण के रथ पर समारूढ़ हुआ था जो वज्र की ध्वजा वाला श्रेष्ठ था । वह रथ लोहे के आठ चक्रों ( पहियों ) से युक्त था । उस रथ में एक हजार अश्व थे ओर व्रज की ध्वजा से सुशोभित था । उस रथ में अनेक प्रकार शस्त्रास्त्र विद्यमान थे तथा बहुत तूणीर भी रखे थे । ऐसे रथ में बैठकर पृथ्वी का पुत्र नरक समर करने के लिए शीघ्र ही चला । वह जब युद्ध के