कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)
श्री वाराह यज्ञोत्पत्ति वर्णन
६०२ श्रीकालिका पुराण ६०२ १९७ श्री वाराह यज्ञोत्पत्ति वर्णन ऋषियों ने कहा-यज्ञ वाराह का देह यज्ञत्व को कैसे प्राप्त हुआ था और वाराह के तीन पुत्र त्रेतात्व कैसे प्राप्त हुए थे ? यह अकालिक प्रलय भगवान ने कैसे किया था और महात्मा वाराह ने महान घोर जनों का क्षय कैसे किया था। किस प्रकार से भगवान शार्ङ्गधारी से मत्स्य के स्वरूप के द्वारा वेदों का त्राण किया था अर्थात् वेदों की सुरक्षा करके उनको सुरक्षित रखा था ? फिर दुबारा यह सृष्टि की रचना कैसे हुई थी और इस भूमि को किसने समुद्धृत किया था ? वह देह कैसे प्रवृत्त हुआ था, यह सब हे महामते! हमको बतलाइए। हे द्विज शार्दूल! इस सबका हाल आपने प्रत्यक्ष रूप से देखा। हे महती मतिवाले! आज हम सब इसके श्रवण करने वाले हो रहे हैं। अतएव हमको आप बतलाने की कृपा कीजिए। मार्कण्डेय मुनि ने कहा-हे द्विज शार्दूलोँ! जो मैंने यहाँ पर एक अद्भुत सृजन किया था उसको सुनिए। आप सब परम सावधान हो जाइए और इस समस्त वेदों के फल को प्रदान करने वाले को सुनिए । यज्ञों में देवगण सन्तुष्ट होते हैं और यज्ञ में सभी कुछ प्रतिष्ठित है। यज्ञ के द्वारा ही पृथ्वी धारण की जाती है और यज्ञ से ही प्रजा का वरण किया करता है। अन्न के द्वारा प्राणी जीवित रहा करते हैं और उस अन्न की उत्पत्ति मेघों के द्वारा होती है। वे मेघ यज्ञों से हुआ करते हैं। इसलिए यह सभी कुछ यज्ञ से ही परिपूर्ण है। वह यज्ञ भगवान शम्भु के द्वारा विदीर्ण किए हुए वाराह के शरीर से ही हुआ था। हे द्विजो! जैसा भी मैं आपको कहता हूँ उसको आप लोग परम सावधान होकर श्रवण कीजिए। मर्म के द्वारा वाराह के शरीर के विदारित होने पर उसी क्षण ब्रह्मा, विष्णु और शिव देवगण ने जल से समुद्धृत करके उस शरीर को वे आकाश के प्रति ले गये थे। उसके भेदन करने वाले भगवान विष्णु के चक्र के द्वारा वह शरीर खण्ड-खण्ड कर दिया गया था। उसके अंग की सन्धियाँ जो थीं वे यज्ञ पृथक्-पृथक् समुत्पन्न हुए थे। हे महर्षियों! जिस अंग से जो समुत्पन्न हुए थे उनका सब आप लोग
१९८ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ श्रवण कीजिए। भौंह और नासिका की सन्धि से महान अध्वर यज्ञ ज्योतिष्टोम नाम वाला उत्पन्न हुआ था। ठोड़ी, कान की सन्धि से वह्निष्टोम नामक यज्ञ समुद्भूत हुआ था। चक्षु और भौहों की सन्धि व ओष्ठों से पौनर्भवष्टोम व क्रत्यष्टोम यज्ञ समुत्पन्न हुआ। जिह्वा के मूल से वृद्धष्टोम और वृहतृष्टोम दो यज्ञ उत्पन्न हुए थे। नीचे जिह्वा के अन्तर्भाग से अतिरात्र और सर्वराज नाम वाले यज्ञों ने जन्म ग्रहण किया था। अध्यापन, ब्रह्म, यज्ञ, पितृ, यज्ञ, तर्पण, होम, दैव, बलि, मौत, नृयज्ञ, अतिथि पूजन स्नान और तर्पण पर्यन्त नित्य यज्ञ सर्वकण्ठ सन्धि से समुत्पन्न हुए थे तथा समस्त विधियाँ जिह्वा से उत्पन्न हुई थीं। वाजिमेध, महामेध तथा नरमेध ये तथा जो अन्य हिंसा के करने वाले यज्ञ हैं वे सब पादों की सन्धि से समुत्पन्न हुए थे। राजसूय यज्ञ अर्थकारी तथा वाजपेय यज्ञ पृष्ठ की सन्धि से समुद्भूत हुए थे और उसी भाँति जो ग्रहण यज्ञ थे वे भी समुत्पन्न हुए थे। प्रतिष्ठा स्वर्ग यज्ञ तथा दान श्रद्धा आदि यज्ञ हृदय की सन्धि से पैदा हुए थे। इसी तरह से सावित्री यज्ञ भी उत्पन्न हुआ था। समस्त सांसारिक अर्थात् संस्कार करने वाले अथवा संस्कारों से सम्बन्ध रखने वाले यज्ञ और जो यज्ञ प्रायश्चित करने वाले हैं। (पापों की शुद्धि के लिए जो भी व्रत, दान, होमादि किए जाते हैं वे प्रायश्चित कहे जाते हैं। ) ये सब मेढ़ की सन्धि से उत्पन्न हुए थे। रक्ष सत्र अर्थात् राक्षस यज्ञ, सर्प सत्र और सभी जो भी अभिचारिक यज्ञ हैं अर्थात् अन्य प्राणियों के मारणात्मक हैं वह सभी उनके खुरों से हुए थे। माया सृष्टि, परमेष्टिग्रीष्यति, भोग सम्भव तथा अग्निष्टोम यज्ञ लाँगूल की सन्धि में समुद्भूत हुए थे। जो नैमित्तिक यज्ञ हैं जिनको कि संकालि आदि पर्वों पर कीर्त्तित किया गया है वे और द्वादश वार्षिक सभी लांगुल सन्धि में समुत्पन्न हुए हैं। तीर्थ, प्रयोग, साम, संकर्षण यज्ञ, आर्क, आकर्षण यज्ञ ये समस्त नाड़ियों की सन्धि से उत्पन्न हुए थे। ऋचोत्कर्ष, क्षेत्रयज्ञ, ये सब जानु में समुत्पन्न हुए थे। हे द्विजसत्तमो! इस रीति के एक सहस्र आठ यज्ञ समुद्भूत थे। निरन्तर
ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ १९९ यज्ञों के लोक जिनके द्वारा इस समय में भी विभावित किए जाते हैं, उत्पन्न हुए थे। इसके पौत्र से स्रुक् उत्पन्न हुई थी और नासिका से स्रुव हुआ था। अन्य जो भी स्रुक् और स्रुव के भेद अभेद हैं वे पौत्र और नासिका से समुद्भूत हुए थे। हे मुनि सत्तमो! उसके ग्रीवा के भाग से प्राग्वंश समुद्भूत हुआ था। इष्टा पूत्ति, जयु धर्म श्रवण के छिद्र से उत्पन्न हुए थे। दाढ़ों से यूप, कुशा और रोम समुत्पन्न हुए थे। उद्गाता, अध्वर्यु, होता और शामित्र ने जन्म ग्रहण किया था। ये अग्र, दक्षिण, वाम अंग, पश्चात् पादों में संगत हैं। पुरोडाश चरु के सहित मस्तिष्क के स्रव से समुद्गत हुए थे। खुर से यज्ञ केतु ने जन्म ग्रहण किया था। रेतोभाग से आज्य और स्वधा मन्त्र समुद्गत हुए थे। यज्ञ का आलय पृष्ठभाग से और हृदय कमल से यज्ञ समुत्पन्न हुआ था। उसकी आत्मा यज्ञ पुरुष है उनकी भुजायें कक्ष से समुद्भूत हुई थीं। इसी प्रकार से जितने भी यज्ञों के भाण्ड हैं और हवियाँ हैं वे सभी यज्ञ वाराह के शरीर से हुए थे। इस रीति से उन यज्ञ वाराह का शरीर यज्ञता को प्राप्त था। ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर ने इस प्रकार से यज्ञ को करके वे फिर यत्नों में तत्पर हुए सुवृत्त, कनक और घोर के समीप में प्राप्त हुए थे। इसके अनन्तर उनके शरीरों को पिण्ड बनाकर पृथक्-पृथक् तीनों देवों ने तीन शरीरों को मुख की वायु से अर्थात् फूँक लगाकर विशेष रूप से धमन किया था। स्वयं ही जगत के सृजन करने वाले फिर दक्षिणाग्नि हो गए थे। भगवान केशव ने कनक के शरीर का धारण किया था। फिर पञ्च वैतान के भोजन करने वाला गार्हपत्याग्नि हुआ था। फिर वाह्वानीय अग्नि उसी क्षण में समुद्भूत हो गया था। इन तीनों से सम्पूर्ण जगत् व्याप्त हो गया था और वह समस्त जगत् तीन मूलों वाला है। हे द्विज श्रेष्ठों! जहाँ पर ये तीनों नित्य ही स्थित रहते हैं वहाँ पर समस्त देवगण अपने अनुचरों के साथ निवास किया करते हैं। यह तीनों का स्वरूप नित्य ही कल्याण का स्थान है और यही तीनों का स्वरूप है। यह त्रयी की विधि का स्थान हैं और यह परम
२०० ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ पुण्य का करने वाला है। जिस जनपद में ये तीनों वह्नियों का हवन किया जाता है उस जनपद में नित्य ही चतुर्वर्ग विद्यमान रहा करता है। चारों वर्ग धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष होते हैं। हे द्विज श्रेष्ठो! जो मुझसे आपने पूछा है वह मैंने सब ही आपको बतला दिया है। जिस प्रकार से यज्ञ वाराह का देह यज्ञत्व को प्राप्त हुआ था और जिस तरह से उनके पुत्रों के देह से वह्नियां हुई थी। मार्कण्डेय महर्षि ने कहा-जिस कारण से भगवान ने आकालित यह प्रलय किया था हे महाभागो! उस वाराह लोक संक्षय का आप श्रवण कीजिए। अथवा जिस तरह से भगवान शार्ङ्गधारी ने मत्स्य के स्वरूप के द्वारा वेदों का त्राण अर्थात् रक्षा की वह मैं सब पापों के विनाश करने वाला आख्यान आप लोगों को बतलाऊँगा। कपिल अवतार आख्यान प्राचीन समय में ईश्वर भगवान विष्णु महामुनि सिद्ध कपिल हुए थे जो स्वयं साक्षात् हर थे और सिद्धों के उत्तम मुनि हुए थे। इस प्रकार से सिद्ध का ध्यान करते हुए यह सम्पूर्ण जगत् स्वतः ही समुत्पन्न हुआ था क्योंकि यह भगवान हरि के शरीर से समुद्गत हुआ था इसी कारण से वह कपिल कहे गये हैं। वह एक बार स्वायम्भुव मनु के अन्तर में होकर मुनि श्रेष्ठ से यह वाक्य कहा था। कपिल देव ने कहा-हे स्वायम्भुव! आप तो मुनियों में बहुत ही अधिक श्रेष्ठ हैं। हे महापते! आप तो ब्रह्मा के ही रूप से समन्वित हैं इस समय में आप प्रार्थना करने वाले मेरे ही अभीष्ट को मुझे प्रदान करिए। यह सम्पूर्ण जगत आपका ही है और आपके द्वारा ही परिपालित है। आपने ही इस सम्पूर्ण जगत् की रचना की है और आप ही इन जगतों के स्वामी हैं। स्वर्ग में, पृथ्वी में और पाताल में, देव, मनुष्य और जन्तुओं में आप ही स्वामी हैं, वरदान देने वाले हैं। रक्षा करने वाले हैं और आप ही एक सनातन हैं अर्थात सर्वदा से चले आने वाले हैं। आप ही धाता, विधाता हैं और आप ही सब ईश्वरों के ईश्वर हैं आप में ही सब कुछ प्रतिष्ठित
൘൘ श्रीकालिका पुराण ൘൘ २०१ ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ है। इस कारण से आप कृपा करके ऐसा स्थान प्रदाए करिए जो तीनों लोकों में महान दुर्लभ होवे। मैं समस्त प्राणियों में होकर प्रत्यक्षदर्शी हूँ। मैं ज्ञानरूपी दीपिका का निर्माण करके इस जगत जात का अर्थात् पूरे जगत् का उद्धार करूँगा। इस समय अज्ञानरूपी सागर में मग्न इस सम्पूर्ण जगत को ज्ञानरूपी प्लव अर्थात् सन्तरण का साधन प्रदान करके मैं तीनों का तारण करूँगा। हे प्रभो! आप हमारे नाथ हैं। पूजा के योग्य हैं और जगत के पालक हैं। महात्मा कपिल के द्वारा इस रीति से कहे गए उन मनु ने फिर उन संशित व्रतों वाले महात्मा कपिल को उत्तर दिया। मनु ने कहा-यदि आप समस्त जगत का भला करने के लिए ज्ञान दीपिका के करने की इच्छा वाले हैं तो फिर आपको इस स्थान की प्रार्थना से क्या करना है? आपने पहले हिरण्यगर्भ के महान अद्भुत तप का तपन किया था जो बहुत ही अद्भुत स्वरूप वाला था। हे द्विज! उसने मुझसे किसी भी स्थान के लिए याचना नहीं की थी कि जहाँ पर तपश्चर्या की जावेगी। भगवान शम्भु तो सम्भोग के सर्वथा शून्य हैं उन्होंने देवों के भाव से वर्षों तक अर्थात् दस हजार वर्षों तक तपश्चर्या की थी किन्तु उन्होंने भी स्थान की कभी इच्छा नहीं की थी। देवेन्द्र, नीतिहोत्र, शमक, राक्षसों का स्वामी, यादवों के पति, मातरिश्वा तथा धनाध्यक्ष कुबेर इन सबने तीव्रतम तप किया था। जो दिक्पाल के पद की इच्छा रखने वाले थे अर्थात् दिक्पाल के पद की प्राप्ति के ही लिए इन सबने तपस्या की थी। हे महामुने! उन्होंने भी किसी भी स्थान के अनुसन्धान करने की इच्छा नहीं की थी। हे कपिल! देवों के आलय, तीर्थ, स्थल, क्षेत्र तथा पवित्र सरितायें बहुत से पुण्य परिपूर्ण स्थान इस भूमि में स्थित हैं उनमें से आप किसी भी एक स्थान की प्राप्त करके तपश्चर्या करते हैं। हे ब्रह्मन्! क्या वहाँ पर तपश्चर्या की सिद्धि नहीं होगी! फिर मुझसे किसी भी स्थान की प्रार्थना करना केवल आपका विकत्थन ही है। यह ऐसा विकत्थन करना तपस्वियों को धर्म युक्त नहीं होता है।
२०२ 卐 श्रीकालिका पुराण 卐 मार्कण्डेय महर्षि ने कहा-स्वायम्भुव मनु के इस वचन का श्रवण करके सिद्ध कपिल बहुत अधिक कुपित हुए थे और उस समय उन्होंने मनु से कहा। कपिल देव बोले-शीघ्र ही सिद्धि प्राप्त करने के लिए मैंने आपसे स्थान की प्रार्थना की थी किन्तु आप तो बहुत से हेतुओं के द्वारा मेरे ही ऊपर आक्षेप कर रहे हैं। आपके इस अत्यन्त उग्र वचन को मैं सहन करने में असमर्थ हूँ। आप स्वयं तीनों भुवनों के अध्यक्ष हैं यही आपका ऐसा गर्व है। आप मुझे आपका यह वचन क्षमा करने के योग्य नहीं है कि आप मेरी की हुई प्रार्थना को विकत्थन कह रहे हैं। ऐसा जो आप कहते हैं उसका यह फल प्राप्त करिए। यह तीनों भुवनों जिसमें देव, असुर और दानव निवास किया करते हैं इनका अब हत-प्रहत और विध्वंस बहुत ही शीघ्र हो जायेगा। जिसने इस पृथ्वी का उद्धार दिया था अथवा जिसके द्वारा यह पुनः स्थापित की गयी थी, जो इसका अन्तकर्ता है अथवा जो इसकी परिरक्षा करने वाला है वे ही सब सम्पूर्ण चराचर की हिंसा करे। हे मनुदेव! आप शीघ्र ही इन तीनों भुवनों को जल से पूर्ण देखेंगे। आपके गर्व के कारण यह सब हत-प्रहन और विध्वंस हो जायेगा। तपों के निधि मुनीन्द्र कपिलदेवे यह वचन कहकर वहीं अन्तर्धान हो गये थे और फिर वे मुनि उसी समय ब्रह्माजी के स्थान को चले गये थे। कपिल देव के इस वचन को सुनकर मनु का मुख विषाद से युक्त हो गया था। वह होनहार है, ऐसा समझकर उस मनु ने कुछ भी नहीं कहा था। इसके अनन्तर परम बुद्धिमान स्वायम्भुव मनु ने तपस्या करने के लिए ही मन में धारणा की थी। वे समस्त जगतों की भलाई के लिए भगवान् गरुड़ध्वज के दर्शन प्राप्त करने की इच्छा वाले हुए थे। वे गंगा द्वार के समीप में परम विशाल बद्रीविशाल को गमन कर गए थे। वहाँ पहुँचकर जत के धर्त्ता स्वायम्भुव मनु ने स्वयं ही पापों के विनाश करने वाली पुण्यतोया बदरी का वहाँ पर दर्शन किया था। जो सदा फलों वाली थी और नित्य ही कोमल शाद्वल की मञ्जरी से समन्वित थी, जो सुन्दर छाया वाली, मसृण और सूखे हुए यंत्रों से रहित थी।
ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ २०३ वह गंगा के जल की राशि से संसिक्त शिखा और मूल सम्पूर्ण मध्य भाग से समन्वित थी, जो निरन्तर अनेक मुनियों और तपस्वियों के द्वारा उपासना की गई थी । वह स्थान सभी प्रकार से परम शुभ था और नाना मृगों के समुदाय से संयुक्त था जिसके जल में विकसित कमल थे, वह परमाधिक रमणीक था । उस स्थान में प्रवेश करके लोकों के भावन करने वाले मुनि ने तपश्चर्या करने के लिए यत्न किया था । वे वहाँ पर नियत आहार वाले परम समाधि से संयुत हो गये थे । वहाँ पर उन्होंने भगवान हरि की समाराधना की थी जो जगत् के कारण के भी कारण हैं तथा समस्त जगतों के नाथ हैं और नीले मेघ तथा अञ्जन की प्रभा के समान से युक्त थे । मनु ने जिस भगवान के स्वरूप का ध्यान किया था उसी का वर्णन किया जाता है । वे शंख, चक्र, गदा और पद्म के धारण करने वाले हैं, कमल के सदृश लोचनों से युक्त हैं, पीत वर्ण के वस्त्र के धारण करने वाले हैं जो देव गरुड़ के ऊपर विराजमान हैं । जो जगत् से परिपूर्ण हैं, लोकों के नाथ हैं तथा व्यक्त और अव्यक्त स्वरूप वाले हैं, जो इस जगत् के बीज हैं और सहस्र नेत्रों वाले तथा सहस्र शिरों से समन्वित प्रभु हैं, जो सबमें व्यापी, सबके आधार, अज, विभु और नारायण हैं । मनु ने सर्व वेदों से परिपूर्ण इस परम मन्त्र का जाप किया । उस मन्त्र का अर्थ यह है-हिरण्यगर्भ पुरुष, प्रधान अव्यक्त रूप वाले, शुद्ध ज्ञान के स्वरूप वाले भगवान वासुदेव के लिए नमस्कार है । इस प्रकार के मन्त्र का जाप करने वाले स्वायम्भुव मनु के ऊपर जगत् के स्वामी भगवान केशव शीघ्र ही प्रसन्न हो गए थे । अब जिस रूप से भगवान ने मनु को दर्शन दिया था उसका वर्णन किया जाता है, फिर एक क्षुद्रझष (मत्स्य) होकर वे सामने प्राप्त हुए थे जो दुर्बादल के समान प्रभा से युक्त थे, जो कर्पूर कलिका के जोड़े के तुल्य नेत्रों से युगल से युक्त परम उज्ज्वल थे । उस समय में एक बहुत छोटे मत्स्य के स्वरूप से युक्त भगवान जनार्दन तपस्या करते हुए स्वायम्भुव मुनि मनु के सामने आये थे जो मनु महान आत्मा वाले थे ।
२०४ ੴ श्रीकालिका पुराण ੴ वे प्रभु उस समय में महान् आत्मा वाले, कारुण्य से युक्त, सुमन्त्रस्त अर्थात् भययुक्त गद्गदता से समन्वित उन स्वायम्भुव मनु से बोले-हे तपोनिधि! हे महाभाग! आप डरे हुए मेरी रक्षा करने के योग्य होते हैं। विशाल मत्स्यों से मैं परमभीत (डरा हुआ) हूँ जो मुझे कहीं खा न जावें इसीलिए मैं नित्य ही उद्वेग वाला रहता है। हे महाभाग! प्रतिदिन की बड़े-बड़े मत्स्य मुझे खाने के लिए मेरे पीछे दौड़ लगाया करते हैं। सभी ओर से बड़ी संख्या में बड़े मत्स्य मुझे खाने के लिए आया करते हैं। हे नाथ! आप मेरी रक्षा करने के लिए समर्थ हैं। आज बड़े-बड़े रोमों वालो से, बड़े और बहुतों के द्वारा मैं विदारित किया गया हूँ। सबसे छोटा थक गया हूँ और भागने में परम असमर्थ हूँ। मैं अपने प्राणों के रक्षित करने की इच्छा वाला हूँ। आप महान आत्मा वाले हैं ऐसे मुनि मैं आपकी शरणागति मैं प्राप्त हुआ हूँ। यह आपका परम अनुग्रह हैं। आप मेरी रक्षा कीजिए। भय से उद्भ्रान्त मन वाला मैं चंचल तरंगों वाली परम चंचल इस वृक्षों की छाया का अवलोकन करके मत्स्य की ही भाँति डर रहा हूँ। मार्कण्डेय मुन ने कहा-इसके अनन्तर इस अनेक वचन का श्रवण करके स्वायम्भुव मनु परमाधिक कृपा से समन्वित होकर उनसे बोले थे कि मैं आपकी रक्षा करने वाला हूँ। फिर हाथ में जल लेकर उस मत्स्य को उसमें निधापति करके समक्ष में उस परमक्षुद्र मत्स्य के विहार का अवलोकन करने लगे थे। इसके अनन्तर परम दयालु मनु ने सुन्दर स्वरूप वाले उस मत्स्य को जल से पूर्ण विपुल योग वाले अलिञ्जर में रखा दिया था। वह मत्स्य उन मणिक में दिन-दिन में बढ़ता हुआ सामान्य रोहित के शरीर वाला शीघ्र ही हो गया। वह महात्मा प्रतिदिन दश घट जल से पूरिपूर्ण उस मणिक को बढ़ाते रहे थे और मत्स्य को वर्धित कर दिया था। अर्थात् वह मत्स्य बड़ा होता चला गया था और बड़े-बड़े नेत्रों वाला एक बालक मत्स्य थोड़े ही समय में उस मणिक के जल के मध्य में लोमों से युक्त पीन देह वाला हो गया था। मार्कण्डेय मुनि ने कहा-स्वायम्भुव मनु ने उस प्रकार से स्थूल
ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ २०५ शरीर वाले उस मत्स्य का अवलोकन स्वयं करके उसको अपने हाथ से ग्रहण करके वे विकसित कमलों से संयुक्त सरोवर को चले गये थे। वह सरोवर वहाँ पर परम पुण्य नर नारायण के आश्रम में बहुत विस्तृत था। वह एक योजन के विस्तार वाला तथा डेढ़ योजन आयताकार था। उसमें उनके भीत गण थे। उस सरोवर में उस मत्स्य को डाल करके उस समय में मनु ने वहाँ पर निर्धारित कर दिया था। उस मत्स्य का उन्होंने अपने पुत्र की ही भाँति परम अनुग्रह से युक्त होकर पालन किया था। वह मत्स्य बहुत ही थोड़े समय में परमाधिक स्थूल और विस्तृत हो गया था। हे श्रेष्ठ द्विजोँ! वह मत्स्य उस सरोवर में भी समाया नहीं था। क्योंकि बहुत ही बड़ा हो गया था। वह मत्स्य एक बार पूर्व और उत्तर दोनों किनारों पर अपना शिर और पूँछ रखकर ऊँचे शरीर वाला हो गया था फिर वह स्वायम्भुव महात्मा से चिल्लाकर बोला-मेरी रक्षा करो। मनु ने उसको स्थूल पूँछ वाला समझकर वह उस समय में उस महामत्स्य के समीप पहुँचे और अपने हाथ के द्वारा उसको उन्होंने ग्रहण किया था। मैं विपुल रोमों वाले अतीव अद्भुत आपका उद्धार करने के लिए समर्थ नहीं होता हूँ, ऐसा भली चिन्तन करते हुए भी उन्होंने हाथ से उसको धारण कर लिया था। विश्व के आत्मा भगवान् जनार्दन भी जिन्होंने मत्स्य का स्वरूप धारण कर रखा था स्वायम्भुव मनु के कर को प्राप्त करके फिर छोटे स्वरूप का उपाश्रय ग्रहण कर लिया। फिर मनु ने करों से उसको उठाकर अपने कन्धे पर धारण किया था और शीघ्र ही उसे सागर में ले गये थे और वहाँ जल में उसको रख दिया था। उन्होंने उस मत्स्य को कहा था-वहाँ आप अपनी इच्छा के अनुसार बढ़िये यहाँ पर कोई भी आपका वध नहीं करेगा और आप शीघ्र ही सम्पूर्ण देह की प्राप्त करिए। यह कहकर समस्त प्राणधारियों में परमश्रेष्ठ वह महान भाग वाले ने उसकी लघुता (छोटेपन) का चिन्तन करते हुए ही परमाधिक विस्मय को प्राप्त हो गये थे। वह मत्स्य भी तुरन्त ही उस समय में महान् पूर्ण शरीरवाले हो गये थे और अपने
देहादिक के द्वारा सभी ओर से उस महासागर को उन्होंने भर दिया था । तात्पर्य यह है कि उन्होंने इतना अधिक अपने शरीर को बढ़ा लिया था कि वह पूरा सागर उससे भी गया था । उस महासागर के जल को भी अतिक्रमण करके अत्यन्त उन्नतपूर्ण शरीर वाले का अवलोकन करके जो कि शिलाओं से घिरे हुए, लम्बा चौड़ा मानसाचल के तुल्य था । सम्पूर्ण सागर को रोकने वाले और अपने देह के विस्तार से अचल करके श्रीमान् स्वायम्भुव मनु ने उस समय उनको मत्स्य नहीं माना था । उस अवसर पर स्वायम्भुव मनु ने उस मत्स्य से फिर शान्तिपूर्वक पूछा था जबकि उनकी अद्भुत मूर्ति का दर्शन किया था और उनके छोटेपन को देखा था। मनु ने कहा-हे परमश्रेष्ठ! मैं केवल आपको मत्स्य ही नहीं मानता हूँ। आप कौन हो, यह मुझे स्पष्ट बतलाने की कृपा करिए ? हे सुमहत्तप! मैं आपके महत्व को और छोटेपन कर चिन्तन करते हुए ही आपको सामान्य मत्स्य ही नहीं मानता हूँ। आप ब्रह्मा हैं अथवा विष्णु हैं या आप शम्भु हैं जिन्होंने यह मत्स्य का स्वरूप धारण किया है। यदि इसमें कुछ गोपनीयता न हो तो, हे महाभाग! हे महामते! मुझे यह स्पष्ट बतलाने की कृपा करिए । मत्स्य भगवान ने कहा-आपके द्वारा मेरी नित्य ही आराधना करनी चाहिए जो सनातन हरि भगवान हैं वही मैं हूँ। इस समय आपकी कामना की सिद्धि के ही लिए में समादित होकर प्रकट हुआ हूँ। हे भूतों के स्वामिन्! आप जो भी मुझ मीन की मूर्ति वाले से जो भी कुछ चाहते हैं वही आज करूँगा। मेरी इस मूर्ति को मन ही समझिए। मार्कण्डेय महर्षि ने कहा-अपरिमित तेज के धारण करने वाले भगवान विष्णु के इस वचन का श्रवण करके और प्रत्यक्ष रूप के केवल भगवान् विष्णु का ज्ञान प्राप्त करके मनु प्रसन्न हुए थे । स्वायम्भुव मनु ने कहा-हे हरे! इस जगत के पर और अपर के आप स्वामी हैं। आप अविनाशी हैं तथा अग्नि, सूर्य और चन्द्र इनको ही तीन नेत्रों को धारण करने वाले हैं। आपकी सेवा में मेरा प्रतिपात निवेदित है। हे सर्वज्ञ! आप जगत के कारण हैं, जगत के धाम हैं, हे
ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ २०७ हरे! आप पर हैं। आप पर और अपर स्वरूप वाले तथा जो पार जाने वाले हैं उनको पार पहुँचाने के कारणरूप हैं। अपनी आत्मा से ही आत्मा को धारण करके हे हरे! आप धरा का रूप धारण करनेवाले हैं। हे त्रिविक्रमू! आप आधार स्वरूप वाले हैं और आप समस्त लोकों का भरण किया करते हैं। हे सुरेश्वर! आप समस्त वेदों से परिपूर्ण एवं श्रेष्ठ हैं। धाम के कारण के भी आप कारण हैं। आप देवों के समुदाय के परम ईशान हैं और नारायण हैं। आपका कोई भी जन्मदाता नहीं है और आप इस जगत की योनि अर्थात् उत्पादक हैं। आप पादरहित हैं तो सदा गति वाले हैं। आप तेज और स्पर्श से रहित हैं। हे ईश्वर! आप सभी के स्वामी हैं। आपका कोई भी आदिकाल नहीं है और आप ही सबके आदि हैं। आप नित्य अनन्तर हैं जो हेम का अण्ड है और इन सब जगतों का बीज हैं और ब्रह्माण्ड की संज्ञा से युक्त है। उस ब्राह्मण्ड के बीज आपका ही तेज होता है। आप ही सबके आधार रूप हैं और आप स्वयं बिना आधार वाले हैं। आप स्वयं तो बिना हेतु वाले हैं किन्तु सबके कारण स्वरूप हैं। हे विश्व के स्वामिन्! हे प्रभो! आप ही समस्त लोकों के प्रभाव अर्थात् जन्म स्थान हैं अथवा जन्म देने वाले हैं। आप सृष्टि, स्थिति और संहार के हेतु हैं। आप विधाता, विष्णु और आत्मा के धारण करने वाले हैं। आपकी सेवा में बारम्बार नमस्कार है। आपकी मूर्ति दस प्रकार की है और वह मूर्ति ऊर्मि षट्क आदि से रहित है। आप ज्योति के स्वामी हैं आप ही अम्भोधि अर्थात् सागर हैं उन आपके किए बारम्बार प्रणाम समर्पित हैं। हे परेश! कौन हैं जो आपके भाव का वर्णन करने में समर्थ हो अर्थात् ऐसा कोई भी नहीं है। जो आप स्थूल से भी स्थूल हैं, अर्थ वर्ग से भी अणु रूप वाले हैं। जो नभ से परे आदित्य के वर्ण वाले थे आज उनके ही मिले मेरा नमस्कार है। जो पुरुष सहस्त्र शीर्षों वाले हैं तथा सहस्त्र चरणों वाले हैं, सहस्त्र चक्षुओं से युक्त हैं और इस पृथ्वी के सभी ओर हैं, जो दश अंगुल के समान परिमाण वाले स्थित थे वही उग्र भगवान् विष्णु यहाँ मेरे ऊपर प्रसन्न
होवें। हे भगवन्! आप तीन की मूर्ति धारण करने वाले हैं। हे हरे! आपको नमस्कार है। हे जगत् के आनन्द स्वरूप वाले आपको नमस्कार है। हे भक्तों के ऊपर प्रेम करने वाले! आपकी सेवा में मेरा प्रणाम है। मार्कण्डेय महर्षि ने कहा-स्वायम्भुव मनु के द्वारा वे भगवान् मत्स्य के स्वरूप धारण करने वाले प्रभु की इस रीति से भली-भाँति स्तुति की गई थी। उस अवसर पर भगवान वासुदेव मेघों के सदृश परम गम्भीर ध्वनि से संयुत होकर बोले थे। श्री भगवान ने कहा-आज मैं आपकी इस तपश्चर्या से परम प्रसन्न हूँ और आपके द्वारा बड़ी ही भक्ति की भावना से बारम्बार मेरी स्तुति भी की गयी है। मुझे आपकी पूजा से और दान से भी परम सन्तोष हुआ है। हे सुव्रत! अब आप वरदान माँग लो। आपका जो भी अभीष्ट अर्थ होगा आपको मैं दूँगा। इसमें कुछ भी विचार करने की आवश्यकता नहीं है। स्वायम्भुव मनु ने कहा-हे विष्णो! आज यदि मुझे कोई वरदान देना है जो कि तीनों लोकों की भलाई करने वाला ही हो तो आप मुझे वरदान देवें। उसको मैं बतलाऊँगा उसमें आप मुझसे श्रवण कीजिए। पूर्व में कपिल मुनि ने मेरे लिए शाप दिया था कि सम्पूर्ण जगत अर्थात् तीनों भुवन हत-प्रहत और विध्वंस हो जायेंगे। जिसने इस पृथ्वी को उद्धृत किया है और जिसके द्वारा यह पृथ्वी प्रतिपालित की गई है और जो इसका संहार करेंगे उन्हीं के द्वारा इसका इस समय में प्लावन होवे। इसके उपरान्त मैं दीन हृदय वाला आपकी ही शरणागति में प्राप्त हुआ हूँ। जिस रीति से यह त्रिभुवन जल से प्लुत (डुबा हुआ) न होवे एवं हत-प्रहत और विध्वंस्त न होवे आप वही वरदान मुझे प्रदान कीजिए। श्री भगवान् ने कहा-हे मनुदेव! मुझसे कपिल कोई भिन्न नहीं है और उसी भाँति मेरे द्वारा ही कहा हुआ समझिए। इस कारण से उन्होंने जो भी कुछ कहा है वह सर्वथा सत्य है। मैं आपकी सहायता करूँगा। हे स्वायम्भुव! इसको आप समझ लीजिए। इस तीनों भुवनों के हत, प्रहत और विध्वंस होने पर एवं जल में निमग्न हो जाने पर मैं श्यामल शृंग समन्वित होऊँगा और आप उस
ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ २०९ समय में मुझको जान लेंगे अर्थात् आपको मेरा ज्ञान प्राप्त हो जायेगा। हे मनुदेव ! जब तक यह जल का प्लवन रहे तभी तक जो भी कुछ आपको करना चाहिए वह अब आप परम सावधान होकर श्रवण कीजिए जो कि परम पथ्य अर्थात् हितकर है वहीं मैं कह रहा हूँ। सब यज्ञ सम्बन्धी कोष्ठों के समूह के द्वारा एक नौका निर्माण कराइये। उस नौका को मैं ऐसी परम बना दूँगा जिससे कि जलों से वह भिदी हुई न होवे। नौका ऐसी होनी चाहिए कि वह दश योजनों के विस्तार से युक्त होवे और तीस योजन पर्यन्त आयत अर्थात् चौड़ी होवे, जो सम्पूर्ण बीजों के अर्थात् बीज के स्वरूप में रहने वालों के धारण करने वाली हो और तीनों भुवनों के वर्धन करने वाली होवे। समस्त यज्ञों से सम्बन्ध रखने वाले वृक्षों के तन्तुओं से निर्मित की जावे। जो नौ योजन तक दीर्घ होने तथा व्यास त्रय तक विस्तृत होवे अर्थात् तीन व्योमों के विस्तार से युक्त होवे। हे मनुदेव! आप शीघ्र ही वृहती वरीरिका बटी करिए जो जगत की धात्री जगत की माया, लोकों की माता और जगतों से परिपूर्ण वह उस रज्जु (रस्सी) को सुदृढ़ कर देंगी जो किसी प्रकार से भी त्रुटित न होवे। इस वर्तमान जल के प्लवन होने के समय उस नौका में सब बीजों को अर्थात् बीज स्वरूपों को रखकर तथा समस्त वेदों को और सात ऋषियों को बिठाकर आप भी उसमें निष्णण हो जाइए। हे मनुदेव! आप दक्ष के साथ मिलाकर मेरा स्मरण करेंगे उसी समय में स्मरण किया हुआ मैं आपके समीप में आ जाऊँगा। मैं श्यामल शृंग से समन्वित होऊँगा। उसी समय में आपको मेरा ज्ञान प्राप्त हो जायेगा। जिस समय पर्यन्त यह तीनों भुवन हत, प्रहत, विध्वंस रहेंगे तभी तक मैं अपने पृष्ठ भाग के द्वारा उस नौका के वहन करने वाला रहूँगा। इसमें लेशमात्र भी संशय का अवसर नहीं है। मेरे शृंग के जल में प्लवित हो जाने पर उस नौका को उस समय में आप वरीरिका से दृढ़ता के साथ सन्धन करेंगे। मेरे शृंग में नौका के निबद्ध हो जाने पर देवों के परिमाण से एक सहस्र वर्षों तक जल का शोषण
२१० ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ करते हुए उस नौका को प्रेरित करूँगा। हे मनुदेव! फिर जलों के शुष्क हो जाने पर हिमालय पर्वत के बहुत ऊँचे शिखर पर उसमें नाव को बाँधकर जिस जाप के योग्य मन्त्र के द्वारा आपने मेरी आराधना की है उस मन्त्र के द्वारा जो मुझे सन्तुष्ट करता है उसको सभी प्रकार की सिद्धियाँ होती हैं। मार्कण्डेय महर्षि ने कहा-इस प्रकार के वरदान देकर वह मत्स्य उनके द्वारा नमस्कृत हुए थे अर्थात् उसने मत्स्य को प्रणाम किया था। फिर वह जगत् के स्वामी लोकों पर अनुग्रह करने वाले अन्तर्धान हो गये थे। स्वायम्भुव मनु भी भगवान हरि के अन्तर्धान हो जाने पर भगवान हरि ने जैसा कहा वैसी ही नौका और रज्जु का निर्माण कराया था। उस समय में स्वायम्भुव मनु ने समस्त यज्ञों से सम्बन्धित वृक्षों को छेदन कराकर उनको उद्धृत करके वस्यादि के द्वारा नौका का निर्माण कराया था। उन वृक्षों के वल्कल (छाल) से समुद्भूत सूत्रों के समूहों से पूर्व में कथित परिमाण से मनु ने वरीरिका की रचना कराई थी। उसके अनन्तर बहुत अधिक काल तक भगवान यज्ञ वाराह विष्णु का, शम्भ का और हर का महान अद्भुत युद्ध हुआ था। इसके उपरान्त जल से प्लावन होने पर तथा तीनों के विध्वंस हो जाने पर उसी समय में रज्जु से नौका को बाँध करके बीजों का आदान करके मनु ने वेदों को और ऋषियों को लाकर उस नौका में रखकर चराचर सबके जल में मग्न हो जाने पर उसी सवार पर मनुदेव ने नाव में स्थित होते हुए मत्स्य मूर्ति भगवान् हरि का स्मरण किया था। इसके अनन्तर शिखर से संयुक्त पर्वत के ही सदृश जलों के ऊपर भगवान् मत्स्य समागत हो गये थे। मत्स्य का स्वरूप धारण करने वाले भगवान् विष्णु एक शृंग से समन्वित वहीं पर समागत हो गये थे और तनिक भी विलम्ब नहीं किया था जहाँ पर नाव से मनुदेव संस्थित हो रहे थे। उस महान भयंकर और बहुत ही विस्तृत जल के समुदाय में नौका पर समारूढ़ होकर जब तक जल चलाचल था तभी तक उस जल के पृष्ठ भाग पर नौका को
൵ श्रीकालिका पुराण ൵ २११ निधापित कर दिया था। जल के प्रकृति में समापन्न होने पर वरीरिका को शृंग में बाँधकर एक सहस्त्र देवों ने वर्षों तक उस नौका को सम्प्रेरित किया था। परमेश्वर प्रभु ने अपनी नाव को अवष्टन्ध करके धारण किया था। जगत् की धात्री योगनिद्रा उस बटीरिका में समासीन हो गयी थी। फिर धीरे-धीरे चिरकाल में जल के शोषण हो जाने पर उस जल के मध्य में पश्चिम हिमालय पर्वत का शिखर सुमग्न हो गया था। हिमालय प्रभु के जो दो सहस्त्र योजन ऊंचा था उसके पचास सहस्त्र उच्छिष्ट (ऊँचा) शृंग था। फिर उस शृंग में उस नाव को बाँधकर मत्स्य के स्वरूप को धारण करने वाले हरि जो जगतों के स्वामी थे उन जलों शोषण करने के लिए तुरन्त गये थे। इसी रीति से भगवान् शार्गधारी विष्णु ने मत्स्य के स्वरूप के द्वारा वेदों की रक्षा की थी। मार्कण्डेय महर्षि ने कहा-कपिल मुनि के शाप से यह आकालिक लय किया गया था। क्योंकि यह अकालिक लय भगवान् के द्वारा ही किया गया था। हे द्विज सप्तमों! यह जैसा हुआ था वैसा ही हमने आपको वर्णन करके बतला दिया है।
श्रीकूर्म अवतार कथा
मार्कण्डेय महर्षि ने कहा-इस अकाल प्रलय के होने के पश्चात् पुनः जिस प्रकार से सृष्टि की रचना हुई थी। हे द्विजसत्तमो! जिसने इस पृथ्वी का उद्धार किया था उसका अब आप लोग श्रवण कीजिए। उस प्रलय के व्यतीत हो जाने पर उस महान बलवान कूर्म के स्वरूप वाले विष्णु भगवान् ने पर्वतों के सहित पृथ्वी को उद्धृत करके अपने पृष्ठ भाग पर धारण कर लिया था और परमेश्वर ने पूर्व की ही भाँति सम्पूर्ण पृथ्वी को समान कर लिया था। शरभ और वाराह का और उनके पुत्रों से पदक्रम से जो भी भूमि विशीर्ण हो गई थी कर्मठ देव ने उसको भी सम कर दिया था। परमेश्वर ने पूर्व की भाँति पृथ्वी को सम करके फिर पृथ्वी के तल में संस्थित अनन्त भगवान् को धारण किया था। इसके अनन्तर ब्रह्मा, विष्णु और हर परमेश्वर ने वहाँ पर
समागत होकर नौका के बीच में विराजमान सात मुनियों को स्वायम्भुव मनु की और दोनों पर नारायणों को और दक्ष को कहने लगे थे-समस्त मुनिगण, पर नारायण, दक्ष और स्वायम्भुव मनु आप सब लोग श्रवण करिए कि जो भी कुछ इस समय में हम बतलाते हैं। वाराह और शरभ के युद्ध से परिपूर्ण सृष्टि विनष्ट हो गई है। अतएव हमको जिस रीति से सृष्टि की रचना करनी चाहिए उसे आप लोग श्रवण करिए। ये दोनों नर और नारायण सृष्टि की रचना करने के ही लिए समुपस्थित हो गये हैं। देवों की संस्थापना करने के लिए परम तप का तपना करें। जनलोक में रहने वाले देवों को ये दोनों आप्यापित करके अपरों को यहाँ समानीत करें और निरन्तर बहुत से गणों का भली-भाँति सृजन करें। हे मुने! नक्षत्रों की, ग्रहों की और उनके स्थानों का सृजन करें। इन दोनों की तपश्चर्या से पूर्व की ही भाँति स्थिरता को प्राप्त होवें। यह महाभाग जनार्दन प्रभु सूर्य के रथ का संस्थान तथा चन्द्रमा के रथ की संस्थत को स्वयं ही करें। हे स्वायम्भुवन मनु! आप पृथ्वी में सब चीजों का चयन करें और पृथ्वी सभी ओर सैशस्यों से परिपूर्ण हो जावे। समस्त औषधियाँ वृक्ष-लता और बल्लियों का सभी ओर आप पुरोहण करें। प्रजापति दक्ष सप्त मुनीन्द्रों के साथ यज्ञ के द्वारा भगवान हरि का अभ्यर्चन करें और वाराह के पुत्रों से समुत्थित इन तीनों अग्नियों का भी यजन करें। आह्वनीय आदि तीन अग्नियाँ होती हैं। यह यज्ञ सृष्टि की रचना के ही लिए वाराह भगवान् के देह से समुद्भूत हुआ था। इसी यज्ञ के द्वारा दक्ष इस सृष्टि की रचना का विस्तार करें। नर और नारायण से तथा सात मुनियों से, दक्ष और आप से भी, यज्ञ से तथा दोनों अग्नियों से इस सृष्टि को स्वर्ग, पाताल और भूमि में सम्पूर्णता को प्राप्त होवे और सृष्टि को आप्यापित करके जिस प्रकार से भी यह सुसम्पन्न हो जावे, यत्न उसी भाँति का करेंगे। आप नित्य ही सृजन का कार्य करिये। इस अनन्तर यह सृष्टि जैसे पहले थी ठीक वैसी ही सुसम्पन्न हो जावे। हे मनु देव! सबसे प्रथम आप इस समय में बीजों का प्ररोहण करें। मार्कण्डेय महर्षि ने कहा-इस रीति
ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ २१३ ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ से महाभाग विधाता विष्णु और वृषभध्वज समस्त पर्वतों को यथास्थान पर स्थापित करने के लिए यह आदेश देकर फिर चले गये थे। उन्होंने मेरु, मन्दर, कैलाश और हिमवान् आदि पर्वतों में समस्त देवों के पुरों को पृथक्-पृथक् कर दिया था। इसके अनन्तर उस नौका या परित्याग करके और वसुन्धरा को अवधूत करके स्वायम्भुव मनु ने सम्पूर्ण सम्पदा के लाभ के लिए भूमि में बीजों का वपन किया था। इसके अनन्तर वृक्ष, लता, बल्ली, गुल्म और वन, शस्य धान्य उसी भाँति औषधियों, बीजकाण्ड, प्ररोह, घ्रतान और जलज अर्थात् कमल, प्रफुल्ल, अशोक और फल, कन्द तथा बल एवं सबके प्राणों की वृद्धि के लिए शाद्वल ही हुए थे। सम्पूर्ण पृथ्वी शस्यों से सम्पन्न थी। वे वृक्ष और शुभ शाद्वल जिस प्रकार के पहले देखे थे जो कि चित्त में हर्ष करने वाले मनु ने अवलोकन पहले किया था। इसके उपरान्त महायोगी नर से महत्तम तप का तपन किया था और महामति वाले नारायण ने देवों के भावन के लिए तपश्चर्या की थी। नारायण और नर ये दोनों ही परम ऋषियों के समान थे। इन्होंने अनामय अर्थात् आमय से रहित तेज से परिपूर्ण परमेश की तप के द्वारा आराधना की थी। वे जनगणों को, वेदों को और देवर्षियों व श्रेष्ठों को लाये थे जो पूर्व में मृत हुए अमर थे। उनके गणों को पृथक-पृथक उन दोनों मुनियों ने महान तप के बल से सृजन किया था। सूर्य और चन्द्र दोनों देवों को तथा दश दिक्पालों को और पाताल तल में निवास करने वालों को भगवान जनार्दन ने स्वयं ही उत्पन्न किया था। भगवान अच्युत ने सूर्य और चन्द्रमा को यथास्थान किया था अर्थात् रचना की थी। पूर्व की ही भाँति इनको योजित कर दिया था और उन दोनों को दिन और रात्रि में स्थित किया था। औषधियों से समुद्गत हो जाने पर और देवों में पृथक्-पृथक् होने पर दक्ष प्रजापति ने महान अध्वर (यज्ञ) करने के लिए प्रारम्भ कर दिया था। कश्यप, अत्रि, वशिष्ठ, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और भारद्वाज ये अमूल सात ऋषि थे। ब्रह्मा के पुत्र दक्ष प्रजापति ने इन पूर्वोक्त सप्त ऋषियों
२१४ श्रीकालिका पुराणे के द्वारा द्वादश वर्ष पर्यन्त महायज्ञ करने का समाचरण किया था। हे द्विजोत्तमो! वहाँ पर ही तीनों अग्नियों में बारम्बार हवन किये जाने पर और उस समय में द्विज के द्वारा यज्ञ स्वरूप वाले वाराह के अभ्यर्चन किए जाने पर उस यज्ञ से ही चार प्रकार की प्रजा पुत्रियाँ समुत्पन्न हुईं थीं जो रूप लावण्य से सुसम्पन्न थीं और सृष्टि के रचना करने के लिए अमित प्रजावली थीं। दक्ष ने उन तेरह पुत्रियों को महान् आत्मा वाले कश्यप मुनि के लिए प्रदान कर दिया था। उससे बहुत-सी सन्ततियाँ समुद्भूत हुई थीं जिनसे यह सम्पूर्ण जगत् व्याप्त हो गया था। उन समस्त प्रजाओं को कश्यप मुनि ही जन्म प्रदान करने वाले अर्थात् जनक हुए थे। हे द्विज शार्दूलो! यह निश्चित है कि कश्यप मुनि ने ही यह सम्पूर्ण जगत समुत्पन्न हुआ था। उनके नाम और उनसे समुत्पन्न होकर पृथक्-पृथक् सब प्रजाओं की आप समस्त मुनिगण सब अब श्रवण कीजिए जिनको मैं भली-भाँति कह रहा हूँ, मुझसे ही आप उनका ज्ञान प्राप्त करिए। अब उन तेरह कन्याओं के नामों को बतलाया जाता है-अदिति, दिति, काला, दतायु, सिंहिका, मुनि, क्रोध, प्रथा, वरिष्ठा, विनता, कपिला और कद्रू ये दक्ष प्रजापति की तेरह पुत्रियाँ कीर्त्तित की गयी थीं। ध्यान करने वाले विधाता के दक्षिण अंगुष्ठा से मुन से यह सम्पन्न हुआ था इसी कारण से देवों और मनुष्यों में यह दक्ष इस नाम से कहा जाता है। ब्रह्माजी के मानस अर्थात् मन से उत्पन्न हुए दश पुत्र पूर्व में वर्णित किए गये हैं। उनमें छः सृष्टि रचना करने वाले हुए थे। उनके नाम ये हैं-मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलय, क्रतु। मरीचि का पुत्र लोकमानव कश्यप उत्पन्न हुआ था। इसकी ही दक्ष की कन्याओं से बहुत-सी प्रजा उत्पन्न हुई थी। इसकी जाया से समुत्पन्न हुई प्रजाओं के अब आप नामों का ज्ञान प्राप्त कर लो। धाता, मित्र, अर्यमा, शक्र, वरुण, सोम, भर्ग, विवस्वान्, पूषा, सविता, त्वष्टा, विष्णु हुए। अदिति के ये द्वादश सुत हुए थे। जो आदित्य इस नाम से कीर्तित हुए थे इनमें जो कनियान् अर्थात् छोटा था
[Page Header] ६८३ श्रीकालिका पुराण ६८३ २१५
[Main Text] वह गुणवान था जो सदा प्रजाओं को तप देता है। वह ही आपका मुख्य वंश के करने वाला कहा जाता है जो कि दिवाकर है। दिति का एक पुत्र था वह गुणवान था जो सदा प्रजाओं को तप देता है। वह ही आपका मुख्य वंश के करने वाला कहा जाता है जो कि दिवाकर है। दिति का एक पुत्र था जो महान बलवान हिरण्यकशिपु नाम वाला हुआ था। उस हिरण्यकशिपु के चार पुत्र थे जो परम हृष्ट और मद तथा बल से समन्वित थे। उनके नाम प्रह्लाद, सलुयाद, वाष्क और शिव थे। प्रह्लाद के तीन पुत्र हुए थे उनमें जो सबसे आदि में हुआ था उनका नाम विरोचन था। कुम्भ, निकुम्भ, बलवान ये तीनों ही प्रह्लादि कहे गये थे। विरोचन के एक सुत समुद्भूत हुआ था जो दान देने में परम श्रेष्ठ एवं विख्यात था उस महान् का नाम बलि था और जो बलि का पुत्र हुआ था वह महान बल वाला बाण नाम से कहा गया था। वह श्रीमान् शम्भु का अनुचर हुआ था और वह महाकाल नाम वाला था। उस बाण के एक सौ पुत्र हुए थे जो कुसुम्भ, मकर आदि नाम वाले थे। दनु के चालीस पुत्र हुए थे उनके नाम बतलाये जाते हैं—शम्बर, नमुचि, प्रलोमा, असिलोमा, केशी, दुर्जय, अप, शिर अश्वशीर्ष, क्षय, शंकु, वियन्मूर्धामहा, बल, वेगवान, केतुमान, स्वर्भानु, अश्व, पति, कुण्ड, वृष, पर्वाजक, अश्वग्रीवा, सूक्ष्म, तरुण्ड, माण्डल, उर्ध्वबाहु, एकचक्र, विरूपाक्ष, हर, आहर, नियन्त्र, निकुम्भ, सूर्य, चन्द्रमा, अन्य ये तीनों पुत्रों के पुत्र थे तथा सूर्य और चन्द्रमा, (दिवाकर, निशानाथ) दोनों देवपुंगव थे। उनके पुत्र और पौत्र तथा उनके पुत्र बहुत से थे। इस सबसे यह जगत् व्याप्त हो रहा है जो कि ये सब बल और वीर्य से समन्वित थे। दनायु के विशेष बलवान चार पुत्र हुए थे। उनके नाम ये हैं—वीरभद्र, विक्षर, वत्स और वृत्त। हे द्विजोत्तमों! इन चारों के बहुत से पुत्र समुद्भूत हुए थे जो सब ही रूप एवं बल से समन्वित थे और इन एक-एक के सौ-सौ पुत्र समुत्पन्न हुए थे। वे चारों दानवों के स्वामी महान् वीर्य, पराक्रम वाले और परम विख्यात हुए। विनाश, क्रोध तथा
२१६ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ क्रोधहन्ता और क्रोधशक्र ये काला के पुत्र बताये गए हैं। सिंहिका का पुत्र राहु उत्पन्न हुआ था जो चन्द्र और सूर्य का मर्दन करने वाला है। सुचन्द्र, चन्द्रहन्ता, चन्द्रविमर्दन, वेगवान्, केतुमान, अयः, सुर्भानु, अश्जोद्यपति, क्रष्टु, अष्टपर्वा, जरु ये सब पुत्र हुए थे। क्रोधा के जो पुत्र हुए थे वे क्रूर कर्मों के करनेवाले थे। सिंहिका और क्रोधा ये दो पुत्रियाँ हुई थीं जो सदा ही क्रूरिकायें थीं। उन दोनों से जो वंश समुद्भूत हुआ था इसलिए वह क्रूरतर कहा गया है। एक ही मुनि का पुत्र उत्पन्न हुआ था जो शुक्र नाम वाला था और महान् कवि हुआ था। यह दैत्य, दानव और कालेय आदि का वह सदा ही गुरु था। उसके चार सुत समुत्पन्न हुए थे जो असुरों को यजन कराने वाले थे। उनके नाम त्वष्टाचार, अत्रि, सौकल और वाग्मी थे। ये तेज में सूर्य के ही सदृश हुए थे। क्रोधात्माओं के तथा सिंहिका के पुत्र की सूति और प्रसूतियों के द्वारा यह सम्पूर्ण चराचर जगत व्याप्त हो रहा है। अर्थात् इनके पौत्र प्रपौत्र आदि इतने अधिक थे कि यह सब जगत उनसे व्याप्त हो गया था। हे द्विजो! उनके जो सन्ततियां क्रम से बढ़ी थीं उनकी अत्यधिक संख्या थी कि बहुत समय लगाकर भी उसकी गणना नहीं की जा सकती है। विनता के पुत्र तार्थ्य, अरिष्टनेमि, अनूप, गरुड़, आरुणि, वारुणि ये सब समुत्पन्न हुए थे। शेष वासुकिराज, तक्षक कुलिन, कर्म, सुमना ये सभी काद्रवेय नाम कहे गये हैं। भीमसेन, उग्रसेन, सुवर्ण, गरुड़, गोपति, धृतराष्ट्र, सूर्य, वर्चर्चा, वीर्यवान्, अर्क, दृष्ट, प्रयुक्त, विश्रुत, सुश्र, भीम, चित्र, रथ, विख्यात, सर्वविद्, वली, शालिशीर्ष, पर्जन्य, कलि, नारद ये सब देव, गन्धर्व देव और मुनि पुत्र कीर्त्तिक किये गए हैं। अनवधा, सानुरागा, संवरा, मार्गणा, प्रिया, असूया, सुभगा और भीमा इस कन्याओं को प्रसूत किया था। समस्त गुणों के समुत्थान स्वरूप तप के ही धन वाले कश्यप मुनि से प्राधा ने विश्वावसु, सुचन्द्र, सुवर्ण, सिद्ध, वह्नि, पूर्ण, पूर्णांक, ब्रह्मचारी, रतिप्रिय और भानु ये दश पुत्रों को जन्म दिया था जो कि प्राधापुत्र कहे गए हैं। ये सब देव गन्धर्व थे जो निरन्तर पुण्य लक्षणों वाले थे।