कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)
पृष्ठ 226, कुल 442 में से
संदर्भ में पढ़ेंकिया करता था। वाण के वचन से यह हयग्रीव की सहायता से देवों के स्वामी इन्द्र को बाधा देता था और मुनियों को भी बाधा दिया करता था। देवेश को तीन प्रकार से जीतकर अदिति के दो कुण्डलों को जो तीनों लोकों में प्रसिद्ध हैं भूमि के पुत्र नरक ने मुनि के शाप से निर्भीत होकर उन कुण्डलों का हरण कर लिया था। इस तरह से देवी को, मुनियों को और विप्रों को बाधा करता हुआ उस भूमि के पुत्र ने पाँच सहस्त्र वर्ष तक प्राग्ज्योतिष में राज्य का शासन किया था। इसी बीच में महान् भार से पीड़ित हुई पृथ्वी देवी ब्रह्मा-विष्णु प्रमुख देवों की शरणागति में अपनी रक्षा के लिए गई थी। वहाँ पृथ्वी ने ब्रह्माजी और विष्णुजी को प्रणाम करके यह कहा-दानव, राक्षस और दैत्य जो हरि के द्वारा सूदित कर दिए गये थे वे सब राजाओं के मन्दिर में इस समय में बल से गर्वित होकर समुत्पन्न हो गये। उनका अधिक भार है कि उसको सहन और वहन करने में समर्थ नहीं हूँ उनकी संख्या इतनी अधिक है कि मैं उन सबकी संख्या बतलाने में भी असमर्थ हूँ और मुझे उत्साह नहीं होता है कि मैं बतलाऊँ। उनमें मुख्य महान् बल वाले आठ सौ सहस्त्र हैं। उनमें भी अत्यधिक बल है। मैं इस समय में उनका भार वहन करने में असमर्थ हूँ। वाण-बलि का पुत्र वीर कंस, धेनुक अरिष्ट, प्रलम्ब, सुनामा, मुरु, शल, मल्ल, चारण और मुष्टिक महान् बलशाली जरासन्ध, नरक, हयग्रीव, निसुन्द और सुन्द हैं। विरुपाक्ष, पाञ्चजन्य, हिडम्ब, बक, बल, जटासुर, किर्मीर, मनायुध, अलम्बुष, सौमाख्या, जरासन्ध, बानर, द्विविद, श्रुतायुध, महादैत्य शतायुध, ऋष्य, शृंग सुत, सुबाहु, अति बाहुक, कालकस्य हिरण्य पुरवासी दैत्य इन सबके पदों के क्षोभो से मैं दिनों दिन विशीर्ण हो रही हूँ। हे सुरोत्तमो! मैं लोकों का वहन करने में असमर्थ हो रही हूँ। आप इनका विनाश करिए। यदि सुरश्रेष्ठ मेरी रक्षा नहीं करोगे तो मैं परमाधिक विशीर्ण होकर इस समय अवश होकर पाताल चली जाऊँगी। इसके अनन्तर ब्रह्मा, भगवान् विष्णु और महेश्वर ने उनके वचन का श्रवण करके कि पृथ्वी के भार का विमोचन हम करेंगे ऐसा