कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)
पृष्ठ 225, कुल 442 में से
संदर्भ में पढ़ें६००४ श्रीकालिका पुराण ६००४ २२७ प्राप्त किए हुए हैं तो देवेश्वर का भी अतिक्रमण करो । विधाता ने जो वर दिया है आपके लिए वह परीक्षण है । अपुत्र आपो जाया में आत्मजा को जन्म दो । इतना कहकर वाण पूजित होकर वहाँ से चला गया । नरक ने भी अपने मित्र द्वारा कहे वचनों के अनुसार ही कार्य करना आरम्भ किया । मार्कण्डेय महर्षि ने कहा- काल के सम्प्राप्त होने पर भूमि के पुत्र भगदत्त, महाशीर्ष, मदवन्त और सुमाली इन चार पुत्रों को समुत्पन्न किया था जो कि महान सत्व वाले, महान वीर्य, पराक्रम वाले और अन्य वीरों के द्वारा दुरासद थे । इसके अनन्तर वाण के वचन के अनुसार हयग्रीव तथा मुरु को बुलाकर उसके साथ सन्धि करके अपनी सेना के अधिपत्य पदों पर अभिषिक्त कर दिया था । भौम के द्वारा नियुक्त किए हुए मुरु और हयग्रीव को सुनकर उस समय में जो-जो भी भूमि पर असुर थे वे भी सब संगत हो गये । नरक के द्वारा समागत मुरु और हयग्रीव को सुनकर सेना के सहित निसुन्द और नाम वाले तथा दैत्य विरूपाक्ष उस समय में ये सभी समागत हो गये थे इसके अनन्तर उस नरक ने सेना के साथ पश्चिम द्वार पर मुरु को द्वार पर नियुक्त किया । पूर्व द्वार पर निसुन्द को और विरूपाक्ष को दक्षिण द्वार पर नियुक्त किया । मध्य में पंचजन सुन्द को सेनापति के पद पर नियुक्त किया था । मुरु, क्षुरान्त और पाशों को छः सहस्रों को योजित किया था । द्वार पर भूमि पुत्र के द्वारा पुर की रक्षा के लिए इनका सत्कार किया गया । इस प्रकार से जो पूर्व में थे तथा उससे भी पहले थे उन अच्छे मन्त्रियों को हटा दिया था । वह असुर निरन्तर असुरों ही साथ से परम प्रसन्न हुआ था । उस भूमि के पुत्र ने पूर्व में ग्रहण किए हुए भाव का परित्याग कर दिया था । वह असुर भाव प्राप्त कर देवों को बाधा दिया करता था । वह न तो देवों को, न मुनियों को और न किन्हीं की सेवा किया करता था । सुरेश्वर को शीघ्र ही उसने हयग्रीव की सहायता से जीत लिया । इस प्रकार से वह आसुर भाव को बढ़ाता हुआ ही पृथ्वी पर विचरण