भारतकोश
कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 243, कुल 442 में से

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पृष्ठ 243

श्रीकालिका पुराण २४५ ही है। जो कि आप तपश्चर्या करने के लिए हिमवान् के प्रस्थ पर स्वयं ही समुपस्थित हो गये हैं। हे परमेश्वर! मैं तो अपने आपको देवेन्द्र से भी अधिक मानता हूँ कि गणों के सहित आपके द्वारा स्वेच्छा से जिस समय में मैं प्राप्त हो गया हूँ। इतना कहकर गिरिराज पुनः अपने घर में आ गये थे। और उसने नियम के लिए अपने परिवारों को तथा गणों को आदेश दिया था। आज से कोई भी गंगावतरण पर नहीं जायेगा। मेरे शासन के बिना जो कोई भी वहाँ पर गमन करेगा उसको मैं दण्डित करूँगा। उस गिरिराज हिमवान् ने इस रीति से अपने लोगों को नियमित करके तिल, पुष्प, कुशा और फल लेकर शीघ्र ही अपनी ही पुत्री के साथ भगवान् शम्भु के समीप गमन किया था। इसके अनन्तर ध्यान में परायण जगन्नाथ शम्भु के समीप में गमन करके सब गणों से समन्विता काली अपनी पुत्री से प्रणाम करवाया। जो तिल पुष्प आदि थे वह सभी उससे उनके आगे रख दिया था। फिर अपनी पुत्री को आगे करके उस शैलों के राजा ने भगवान् शम्भु से यह कहा—हे भगवान्! मेरी पुत्री आपकी आराधना करने के लिए समादिष्ट है और आपकी आराधना की इच्छा से यहाँ पर लाई गई है। यदि आपका मेरे ऊपर अनुग्रह है तो आप इसको सेवा करने के लिए अनुज्ञा प्रदान कीजिए। इसके अनन्तर भगवान् शंकर ने उसका अवलोकन किया था कि वह प्रथम यौवन में आरूढ़ थी और उसके विकसित कमलों के सदृश एवं उसका मुख पूर्णचन्द्र के समान था। वह समग्र केशों के समूह से वेश विजृम्भिका को प्राप्त हुई थी। उसकी ग्रीवा कम्बु के समान थी। उसके नेत्र विशाल थे और उसके दोनों कानों का जोड़ा परम सुन्दर एवं उज्जवल था। मृणाल के सदृश आयत पर्यन्त बाहुओं के युग्म से वह परम मनोहर थीं। उसके कुण्डलों के स्थान में कमल थे और पीन एवं उन्नत स्तनों से शोभित थी। सुन्दर और क्षीण मध्यभाग के धारण करने वाले थी और उसके दोनों पादों से वह परम मनोरम थी। मध्य भाग से क्षीण, महान् सत्त्व वाली स्थूल

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