कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)
पृष्ठ 244, कुल 442 में से
संदर्भ में पढ़ेंऔर धन वृत्त से उज्जवल थी। उसकी जंघायें सुन्दर थीं। नाग के समान उसकी नासिका थी तथा वह निम्न नाभि से भूषित थी। उसकी जंघाओं के अग्रभाग सुवृत्त और सुन्दर थे। तीन संस्थाओं में गम्भीर और छः स्थानों में समुन्नत थी। सभी सुलक्षणों से सम्पन्न वह तीनों लोकों में दुर्लभ थी। ध्यान के पिंजर में बंधे हुए मुनियों के मन को भी दर्शन करने ही से भ्रष्ट करने में समर्थ वह योषितों के समूह की शिरोमणि थी। उस मनोहर को देखकर तपश्चर्या के लिए नित्य ध्यान करने वालों को विघ्नों का हेतु और अनुराग को बढ़ाने वाली तथा कामरूपी थी। उस गिरिराज के वचन से उसकी पुत्री को भगवान् शंकर ने जो गौरव से भी गौरव थे सेवा करने के लिए स्वीकार कर लिया था। भगवान् शम्भु ने कहा था कि शैलराज! यह आपकी पुत्री अपनी सखियों के साथ नित्य ही मेरी सेवा करने के लिए निर्भीक होकर स्थित रहे। यह कहकर भगवान् हर ने उस देवी को सेवा के लिए ग्रहण कर लिया था। यही महान् धैर्य है कि विघ्न बाधा न कर डालें। विघ्न रहित विघ्न के हेतु को पराभूत करके जो प्रवृत्त होता है, वह तपों का महत्व है और तपस्वियों की धीरता है। इसके अनन्तर गिरिराज अपने परिचारकों के सहित अपने पुर में आ गया था और भगवान् शम्भु ध्यान के योग से परेशा का चिन्तन करने के लिए स्थित हो गये। काली अपनी सखियों के साथ महादेव चन्द्रशेखर की सेवा करती हुई गमन और आगमनों के द्वारा स्थित हो गयी थी। किसी समय वह सखियों के सहित भगवान् शंकर के आगे शुभ गीत का विस्तार करती हुई पञ्चम स्वर में गान किया करती थी। किसी समय वह भगवान् हर के लिए कुश, पुष्प, आदि समिधा और जन से सखियों के सहित स्नान का सत्कार करती हुई उस समय वहाँ पर निवास करती थी। किसी समय नियत रूप से शिव के मुख का वीक्षण करती हुई सकाम होकर उनके विषय में चिन्तन करती थी तब भी वह हर के मुख का चिन्तन किया करती थी। किस समय यह भूतेश्वर मेरा पाणिग्रहण करेंगे और अनेक सद्भावों की भावनाओं से