कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंॐ श्रीकालिका पुराण ॐ २४१ प्रतिदिन वृद्धि को प्राप्त हुई वह सुन्दरी चन्द्रबिम्ब की कला ही की भाँति शोभा धारण करने लगी अर्थात् वह दिनों दिन विशेष सुन्दरी होती चली गयी थी । वह बालिका भाव को प्राप्त हुई क्रीड़ा करती सखियों के साथ परम प्रसन्नता को प्राप्त होती थी। जिस प्रकार से सरिताओं के समुदायों से कालिन्दी विपुलता को प्राप्त किया करती हैं। षड्गुणों ने स्वयं ही उस देवी के पूर्व जन्म के वशीकृतता को प्राप्त कर लिया था। हे द्विज श्रेष्ठों! वे षड्गुण वर्षा को कालिका के ही समान स्वयं ही उसके समीप आ कर उपस्थित हो गये थे। उस देवी ने अपने गुणों से देवी की कन्याओं का भी अतिक्रमण कर दिया था अर्थात् देव कन्याओं से भी अधिक गुणों वाली हो गई थी। अपने रूप लावण्य से अब अप्सराओं से भी अधिक थी। वह बाल्यकाल में ही निरन्तर बन्धु वर्ग की प्रिय और शुभ थी। उसने सद्गुणों के द्वारा अपने बन्धुओं के द्वारा अपने बन्धुओं को माता और पिता कर दिया था। वह जगन्माता नित्य ही अपनी माता का स्तवन करने वाली थी और अपने पिता के यजन करने में तत्पर रहा करती थी। वह सर्वदा अपने भाइयों के साथ रहने वाली, वह सम्पूर्ण जगती की माता सर्वदा कन्या के स्वरूप में समुपस्थित हुई थी। जिस तरह से विभावसु के समीप में कालिन्दी निवास किया करती है उसी भाँति वह भी सदा अपने पिता के समीप निवास किया करती है। इसके अनन्तर एक बार हिमवान् गिरि उसे अपने पास रखकर अपने पुत्रों के साथ संगत होकर परम कौतुक से स्थित हुए थे। इसके उपरान्त देवलोक से नारद मुनि वहाँ पधारे। उन्होंने हिमवान् को सुतों के साथ सुखपूर्वक आसीन देखा था। उनके निकट उन्होंने सूर्य से कालिका के समान ही काली का भी अवलोकन किया था जैसे चन्द्रमा की चाँदनी हो जो कि शरत्काल की रात्रि में भली भाँति बढ़ी हुई हुआ करती है। उस गिरिराज के द्वारा उन नारद मुनि का अभ्यर्चन किया गया था और उनको आसन आसीन होने के लिए दिया गया। उस आसन पर बैठे हुए देवर्षि नारदजी ने सबसे प्रथम उस पर्वतराज से