कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंൠൡ श्रीकालिका पुराण ൠൡ २४३ ︽❖︾︽❖︾︽❖︾︽❖︾︽❖︾︽❖︾︽❖︾︽❖︾︽❖︾︽❖︾︽❖︾︽❖︾ हे प्रिये! हे सति! तुम्हारे बिना मैं अन्य किसी भी वनिता को अपनी भार्या बनाने के लिए ग्रहण नहीं करूँगा। यह सर्वथा सत्य है जिससे मैं आपको बता रहा हूँ। अब उस सती के मृत को जाने पर वे कैसे अन्य स्त्री का ग्रहण करेंगे। देवर्षि नारदजी ने कहा हे गिरिराज! इस विषय में आपको चिन्ता नहीं करनी चाहिए। आपकी पुत्री सती ही उत्पन्न हुई है और यह हर के लिए ही जन्म धारण करने वाली हुई है। इसमें लेशमात्र भी संशय नहीं है। इतना कहकर ही देवर्षि नारदजी ने गिरिराज से यह सभी कहकर सुना दिया था जिस तरह से सती मेनका के उदर से समुत्पन्न हुई थी। गिरिराज ने वह सब पूर्व में घटित वृत्तान्त नारदजी के मुख से श्रवण किया तो वह अपने पुत्रों और द्वारा के सहित संशयहीन हो गये। उस अवसर पर काली ने नारद जी के मुख से यह कथा का श्रवण किया था और वह लज्जा से नीचे की ओर मुख वाली हो गई थी और मन्द मुस्कान में विस्तृत सुख वाली हो गई थी। गिरि हिमवान् ने उस सती को हाथ से पकड़कर और मुख को ऊपर की ओर उठाकर उसके मस्तक पर आघ्राण करके उसको अपने ही आसन पर बिठा लिया था। इसके अनन्तर नारदजी ने पुनः शैलराज की पुत्री से कहा था। जिससे गिरिराज और तनयों के सहित मेनका को बड़ा हर्ष हो रहा था। हे शैलराज! आपके इस सिंहासन से इनको क्या होगा। इसका आसन तो सदा ही भगवान् शम्भु के ऊरु होगा। अर्थात् आपके द्वारा दिया हुआ सिंहासन का आसन इसके लिए कोई महत्व की बात नहीं है क्योंकि यह तो शम्भु के ऊरुओं पर बैठने वाली होगी। हे गिरि! हर के ऊरुओं का आसन प्राप्त करके इसे अन्य किसी भी आसन पर तुष्टि की प्राप्ति नहीं हो सकती हैं। देवर्षि नारदजी ने परम आदर वचन शैलराज से कहा था और देवयानों के द्वारा वे उसी क्षण स्वर्ग चले गये। गिरिपति भी चिन्ता, हर्ष और सम्मोह से संयुत होकर अपनी अचला भार्या के सहित पद्म गर्भ अन्तःपुर में प्रवेश कर गये।