कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें൵ श्रीकालिका पुराण ൵ २५३ मदन ने कहा-हे इन्द्र देव! मैं आपके वचन को पूर्ण करूँगा और गिरिजा के साथ भगवान् शम्भु को संगत कर दूँगा जैसा कि पहले दाक्षायणी के साथ किया था। किन्तु शम्भु के मोहन करने में आप मेरी एक सहायता करें। जिस समय में सम्मोहन के द्वारा हर का सम्मोहन करूँ उस अवसर पर आप मेरी सहायता करें। मैं सुरभि के द्वारा प्रवेश करके अर्थात् शंकर के आश्रम में शीघ्र ही प्रविष्ट होकर सर्वप्रथम दर्पण के द्वारा मन से विकार समुत्पन्न करके फिर सम्मोहन के द्वारा दृढ़ता से वृषध्वज को मोहित कर दूँगा। आप काल के प्राप्त होने पर मेरा स्मरण करोगे और पालन का ध्यान रखोगे। हे बलसूदन! वह कार्य करने के लिए मैं जाता हूँ। मार्कण्डेय महर्षि ने कहा-इतना कहकर वह कामदेव शंकर के आश्रम में गया। इन्द्र ने भी उस अवसर पर सब देवों से यह कहा था कि जहाँ पर कामदेव जाता है वहाँ पर आप लोग इसकी सहायता करें। वहाँ-वहाँ पर अनुगमन करके समय-समय पर मुझको बताओगे। जिस सम्मोहन के द्वारा यह कामदेव भगवान् शंकर को सम्मोहन करेगा हे सुरगणो! उस समय में मैं भी वहाँ पर जाऊँगा-ऐसा मुझको जान लो। इस प्रकार इन्द्रदेव द्वारा कहे गये देवगण कामदेव के पास चले गये थे। वह कामदेव भी गमन कर गया था जहाँ पर शम्भु गिरि के गंगावतरण स्थल में हिमाचल के शिखर पर थे। उसने सुरभि को नियोजित कर दिया था। इसके अनन्तर सुरभि के वहाँ पर पहुँचने पर जिसका कि वह लक्षण था कि शीघ्र ही भाँति-भाँति के तरु-लता और गुल्मों में पुष्प खिल गये थे। वहाँ पर किंशुक विकसित थे और मञ्जुल के तरु भी पुष्पित हो गये थे। सभी सरोवर खिले हुए पद्मों से शोभायमान हो गये थे तथा सभी तन्तुओं को विकार हो गया था। उस समय सुगन्धित वायु बहने लगी थी जिसमें पुष्पों के रेणु सम्मिलित थे। जो धीरे-धीरे सुखकर होकर मन को आकर्षित कर रहा था। सभी पक्षीगण, मृगवर्ग और जो भी प्राणधारी जीव थे और सिद्ध एवं किन्नरगण ने एकान्त भाव को विस्तृत किया था और वे नूतन बौरों के