कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२५२ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ हो उसका भी योजित कर दीजिए । इन्द्र देव ने कहा-जिसके कराने की इच्छा कर रहा हूँ हे मनोभव! आपसे जो भी कराना चाहता हूँ, वह आपका समुचित कर्म है । उसमें आप परिवृत हैं । आप उसमें कृतकर्मा हैं, आपको उस कर्म का अनुभव हैं। हे मनोभव! आप कृती हैं। आपको छोड़ कर अन्यों से वह कर्म दुस्साध्य है । इसी से मैं आपका नियोजन करता हूँ । यह सुना जा रहा कि हिमालय के प्रस्थ में वृषभध्वज ध्यान में स्थित हैं और वधू के लिए वे आकांक्षा से रहित हैं। पिता के वचन से काली सखियों के सहित नित्य ही हर की अनुमति में होकर अब सेवा किया करती है। वे शम्भु तपश्चर्या कर रहे हैं। यद्यपि वह समारूढ़ यौवन वाली युवती है, स्त्रियों में रत्न के समान परम दिव्य हैं और अत्यधिक सुन्दरी भी हैं किन्तु महादेवजी ध्यान में ऐसे आसक्त हैं कि उसको मन से भी नहीं चाहते हैं। अतः जिस रीति से भी आप यह कार्य करिये । इनमें देवों का और जगतों का परमहित हैं यही जानकर आप ऐसा करें । वृषभध्वज जिस प्रकार से भी उस सती के साथ अनुराग वाले होकर रमण करें, वैसा ही करें। उसके रमण करने पर हर का जो तेज प्रच्युत होगा और उससे जो भी पुत्र समुत्पन्न होगा वही हमारा इस तारक से उद्धार करेगा । मार्कण्डेय मुनि ने कहा-इसके अनन्तर कामदेव ने देवराज के वचन का श्रवण करके पहले ब्रह्माजी के दिये हुए शाप का काल प्राप्त हो गया है । यह स्मरण किया था । सन्ध्या करने वाले विधाता पर जिस समय अपने शस्त्र की परीक्षा की थी जो उस समय कामदेव ने पुष्प के वाणों से प्रहार किया था और उसी अवसर पर विधाता ने उसको शाप दे दिया था । हे द्विजोत्तमो ! विधाता ने कहा कि तू शम्भू के नेत्र की अग्नि से दग्ध हो जायेगा। जिस समय भगवान् हर गिरि की पुत्री को पाणिप्रणीता भार्या करेंगे उसी समय आप शरीर के द्वारा सम्पूर्णता को प्राप्त कर लेंगे । इस विधाता के शाप का स्मरण करके भयभीत कामदेव ने शुक्र के वचन से हर को काली के साथ योजित कर देने के कार्य को स्वीकार कर लिया था। और फिर उस काल के सदृश कामदेव से यह वचन कहा था।