कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६०-३ श्रीकालिका पुराण ६०-३ २५१ शम्भु सुतोत्पति हो जावे, इस कार्य के सम्पादन करने में देवगण प्रयत्नशील हो गये थे। इसके अनन्तर इन्द्र देव के साथ संङ्गत होकर ऐसा निश्चय कर लिया था कि शम्भु को सुतोत्पति के लिए उद्यत किया जावे। इन्द्र देव ने कामदेव को बुलाकर उससे यह वचन कहा था। इन्द्र देव ने कहा- आपके द्वारा इस विश्व की प्रसूति की जाती है और आपके ही द्वारा विश्व का पालन किया जाता है। पहले आप ही ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र की प्रीति का हेतु हुए थे। ब्रह्माजी ने किसी समय में प्रीति से जिस प्रकार से चरित व्रत वाली सावित्री का ग्रहण कर लिया था। भगवान् माधव ने लक्ष्मी का ग्रहण किया था और भगवान् हर ने दाक्षायणी का ग्रहण कर लिया था। पहले समय में देवेशों की प्रीति के लिए जैसे उनको वर दिया था उसी भाँति अब मेरी भी प्रीति करिये। आप तो सदा ही प्राणधारियों की प्रीति के करने वाले हैं। हे काम! आप स्वर्ग, पाताल और भूमण्डल में किसके प्रिय नहीं है। आप जंगल के प्राणधारियों का सभी का अभिमत हैं। देव, दानव, यक्ष, राक्षस और मनुष्यों के आप पालक तथा कर्त्ता हैं और आप सब सम्पूर्ण जगतों के हित के सम्पादन करने के लिए विशेष चेष्टा कीजिए। जिससे देव, दानव, यक्ष और महात्मा तथा मनुष्यों का हित हो वही करिये। मार्कण्डेय मुनि ने कहा-मकरध्वज ने यह इन्द्र का वचन श्रवण करके उसके वचन रूपी अमृतों से बहुत ही प्रसन्न होकर देवराज से कहा। जहाँ मेरी ईशता है, हे शुक्र! वह कर्म आपको ज्ञात ही है इस कारण जो मैं कर सकता हूँ उसे मैं करूँगा। आप इसका निर्देश कीजिए। मेरे पाँच ही बाण हैं जो बहुत ही कोमल पुष्पमेध हैं। मेरा चाप भी पुष्पों से परिपूर्ण हैं और उस चाप की डोरी भ्रमरों के स्वरूप वाली हैं। रति मेरी प्यारी जाया हैं। बसन्त मेरा सचिव है। मलय से सम्भूत वायु यन्ता है और मेरा मित्र सुधानिधि चन्द्रमा है। मेरी सेना का अधिक श्रृंगार हैं और हाव तथा भाव मेरे सैनिक हैं। ये सभी मेरे सहयोगी क्रूरता से रहित और कोमल हैं और मैं भी वैसा ही मृदु हूँ। आप तो धीमान् है मेरे करने का जो भी समुचित कार्य