कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२५० ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ
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है दूसरी कोई भी अन्य बाला ऐसी शक्तिशाली नहीं है। उससे जो भी
पुत्र उत्पन्न होगा वह ही इस तारक नामक राक्षस का हनन करने वाला
है, अन्य कोई भी नहीं है। वह गिरिराज की पुत्री इस समय में समारूढ़
यौवन वाली अर्थात् पूर्ण युवती है। गिरि के प्रस्थ पर तप श्रर्या नित्य
ही करने वाले उन भगवान् के वाक्य से ही अपनी सखियों के साथ
ध्यान में स्थित परमेश्वर सर्वज्ञ की वह सेवा कर रही है।
अपने आगे विद्यमान रहने वाली तीनों लोकों में वरवर्णिनी के
ध्यान में समासक्त महादेव मन से भी यही चाहते हैं। चन्द्रशेखर जिस
रीति से भी उस काली को अपनी माया बनाना चाहें, हे देवगणों! आप
लोग वैसा ही यत्नपूर्वक शीघ्र ही करें। आप लोगों को स्वर्ग अपना
स्थान है। उससे मैं तारक को भी निवृत्त कर दूँगा। मैं उसके साथ संगत
होऊँगा। आप लोग दुःखों से रहित होकर ही यहाँ से गमन कीजिए।
इतना कहकर सब लोकों के स्वामी तारक नामक दैत्य के पास उपस्थित
हुए थे। उसके समीप जाकर यह वचन उन्होंने कहा। हे तारक! आप
स्वर्ग के राज्य को शासन करें। उसके लिए आपने पहले तपस्या नहीं
की थी। मैंने भी ऐसा वरदान नहीं दिया था कि मेरे द्वारा आप स्वर्ग
के राजा होवें। इस कारण स्वर्ग का परित्याग करके भूमि पर भी राज्य
के शासन को करें। हे असुर! देवों के योग्य भोगों का उपभोग करने
के लिए आपको वहीं पर भूमि में सब पदार्थ प्राप्त होंगे। इतना कहकर
सब लोकों के स्वामी ब्रह्माजी जी वहीं पर अन्तर्धान हो गये थे।
वह तारक भी स्वर्ग का परित्याग करके इसके उपरान्त भूमि पर
समागत हो गया था। वहाँ पर ही संस्थित होकर वह नित्य ही देवों को
बोधित किया करता था। उसने इन्द्र को कर देने वाला बना दिया था
और उस महान् बलवान् को अपने निर्देश में स्थित कर दिया। इन्द्र देव
उसको निरन्तर देवों के भोगने के योग्य पदार्थों को समर्पित करते हुए
भी सेवा करके उस ईश्वर को सन्तुष्ट करने में समर्थ नहीं हुआ था।
इस रीति से उसके द्वारा उत्पीड़ित हुए और क्रोध से परिपीड़ित होते हुए
देवों ने विधाता के उपदेश से भगवान् शम्भु के वंश में यत्न किया था।