भारतकोश
कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

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[Page Header] ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ २५९ ॐ-ॐ-ॐ-ॐ-ॐ-ॐ-ॐ-ॐ-ॐ-ॐ-ॐ-ॐ-ॐ-ॐ-ॐ-ॐ-ॐ-ॐ-ॐ-ॐ-ॐ-ॐ-ॐ-ॐ-ॐ

[Page Body] स्वर्ग गमन कर गये थे और उसकी बुद्धि व्रत करने में निश्चित हो गई । इसके अनन्तर देवर्षि के गमन करने पर काली मेनका के समीप पहुँची थी और मेनका से तप करने को बतलाया था । काली ने कहा-हे माता! मैं महेश्वर की प्राप्ति के लिए तप करने के लिए गमन करूँगी । आज तप के लिए तपोवन को गमन करने के लिए आप मुझे आज्ञा करिए । मेरे तप करने का निश्चय आप पिताजी से शीघ्र ही निवेदन कर दीजिए । हे जननि! जब तक मैं भूतेश्वर के विरह की अग्नि से दग्ध न होऊँ इससे पूर्व ही में तप करना चाहती हूँ । काली के इस वचन को श्रवण करके माता शोक से, कर्षित हो गयी थी । उसने अपनी पुत्री का आलिंगन करके उससे कहा था-हे वल्लभे! तपस्या मत करो । हे बेटी तुम्हारा शरीर बहुत ही कोमल है, तपश्चर्या जैसे कठोर कर्म करने के लिए गमन मत करो, तपस्या के कष्ट को सहन करने के लिए मुनियों का शरीर ही समर्थ होता है । तुम्हारा शरीर क्लेश को सहन करने की क्षमता नहीं रखता है । हे पुत्री! आपका वन में निवास करना तो शत्रुगणों को कभी अभीष्ट नहीं हैं । इसी कारण से वन में तप के विचार का परित्याग कर दो । तुम्हारे शरीर के जो अनुरूप हो वही तप करो जो हित के सम्पादन करने वाला होवे । मार्कण्डेय महर्षि ने कहा-उस गिरिजा ने माता के वचन का श्रवण किया और वह हीन मन वाली हो गई थी । और वे तपस्या के यत्न में परायण हुई उस समय उसने माता से यह वचन कहा था-मुझे निषेध मत करो । मैं आज तप के लिए तपोवन गमन करूँगी । यदि आपके द्वारा मुझे आज्ञा नहीं दी गई तो में छिपकर चली जाऊँगी । मेनका ने कहा-हे पुत्री! गृहों में ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदि देवगण निरन्तर ही निवास किया करते हैं । इस कारण से तुम जो भी देव अभीष्ट हो उनका घर में ही अभ्यर्चन करो । अपने स्वामी के रहित होकर स्त्रियों की तपोवन में गति का होना कभी नहीं सुना गया है । इस कारण से हे पुत्री! वन की ओर गमन करके तपश्चर्या की यात्रा करना उचित नहीं प्रतीत होता है ।