कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२६० ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ क्योंकि मेनका के द्वारा तपस्या के लिए वन में जाना निरस्त कर दिया था अर्थात् निषेध कर दिया गया था उस समय में सती उमा ने सोमा-यह नाम प्राप्त कर लिया था। उस अवसर पर हिमाचल की पुत्री ने माता की अवज्ञा करके सखियों के द्वारा तप करने का उद्यम पिता के ज्ञापित किया था। उस गिरियों के स्वामी ने तप के लिए समाचरित उद्यम का ज्ञान प्राप्त करके अत्यन्त प्रसन्न मन वाला न होते हुए ही अपनी पुत्री को अनुमति दे दी थी। उसी समय सती ने पिता को अनुज्ञापित करके जहाँ पर कामदेव शम्भु के द्वारा दग्ध किया था उसी गंगावतरण की ओर वह चली गयी। गंगावतरण को काली ने भगवान् हर के रहित ही देखा था। उस समय में उसकी चिन्तो से संयुत हो गई थी। पहले जहाँ स्थित होकर शम्भु बहुत ध्यान वाले हुए थे। वह काली वहाँ पर स्थित होकर विरह से पीड़ित हो रही थी। गिरि की पुत्री वहाँ पर 'हाहा' कहती हुई चिन्ता और शोक से समन्वित तथा अत्यन्त दुःख से पीड़ित हो विलाप करने लगी थी। क्षण भर तक काली ने विलाप किया था फिर उसी समय में उसको पूर्व उद्भव का स्मरण हो गया था। कमलों के समान नेत्रों वाली उमा ने हर के हार्द को और मोह को प्राप्त किया था। इसके पश्चात् चिरकाल उस भामिनी ने धीरता से मोह का संस्तम्भन किया था और वहीं पर नियम के लिए वह रुक गई थीं और हिमवान् की सुता नियम के लिए दीक्षित हो गई थी। उसका प्रथम नियम फलों का ही भोजन करके रहना था। पञ्च अग्नियों की तपस्या ही उसकी चर्या थी, शाम्भवी अर्थात् शम्भु से सम्बन्ध रखने वाली चिन्ता थी तथो सम्बन्धित जप था। यज्ञिय अर्थात् यज्ञ में काम आने वाले सूखे काष्ठों से चारों वह्नियों की स्थापना करके जो वैश्वानर की दृष्टि के द्वारा की गई थी। उनके मध्य में स्थित होती हुई वल्कलों के वस्त्रों वाली सूर्य के बिम्ब का वीक्षण करती थी। ग्रीष्म ऋतु को अग्नि के मध्य में और शिशिर में वह जल से वास करने वाली हुई थी। प्रथम समय फलों के द्वारा और द्वितीय समय केवल जल से व्यतीत किया था। तीसरा